मिट्टी मेरे गाँव की

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सौ दण्डी एक बुन्देलखण्डी अथवा सुभद्राकुमारी चौहान की कालजयी रचना बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,…. के बोल सुनकर बुन्देली माटी के गौरवशाली इतिहास से देश का बच्चा-बच्चा परिचित है! बुन्देली शौर्य जहाँ का कण-कण गाता हो, जहाँ रस, छन्द, अलंकारों से अनुप्राणित धारा सतत प्रवहमान रहती हो, वहाँ गीतों की सरितायें प्रवाहित होना स्वाभाविक ही है!
इन्हीं गीतों की अमर गिरा में बसने को आतुर हैं – बुन्देली रचनाकारा जयति जैन नूतन की नवीन कृति बुन्देली काव्य-संग्रह – मिट्टी मेरे गाँव की..!
इस कृति का बाहरी आवरण जितना आकर्षक और रंगीन है उसके भीतर कविताओं का संग्रह लेखिका के संवेदनशील हृदय का परिचायक तो है ही, साथ ही अपनी माटी और मानुष के अभिन्न सम्बन्धों की सुगन्ध बिखेरने वाला भी है।
इस काव्य संग्रह में लेखिका ने 58 रचनाओं के माध्यम से अपनी जन्मभूमि की परम्परा, उत्सव, विभिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों का प्रतिनिधित्व, आपसी सम्बन्धों, उनकी आवश्यकता और नैसर्गिक छेड़खानी का अच्छा मिश्रण किया है।
इस काव्य संग्रह का जायका तब और बढ़ जाता है जब इस भाषा के शब्दों को जानने-समझने के लिये शब्द-कोश का सहारा नहीं लेना पड़ता अपितु काव्य संग्रह में आये अनेक बुन्देली शब्दों का अर्थ बुन्देली शब्दावली में देखा जा सकता है जो कि कविताओं के अन्त में दी गयी है।
चूंकि लेखिका स्वयं इसी भूमि से हैं और अपनी माटी से प्रेम किसे नहीं होता है! यही प्रदर्शन लेखिका ने इस काव्य संग्रह में किया है जिनमें टेड़ी लुगाई, करिया साँप, बात फैल गयी, अच्छे दिना, प्रेम, फैशन जैसी कविताओं से अपनी सभ्यता और संस्कृति का पक्ष लेती हुयीं नज़र आतीं हैं, वहीं दूसरी ओर छान्दसिक नियम में निबद्ध भाग्य,लातन के भूत, गाँव की माटी आदि अनेक कविताओं में अपने रीति-रिव़ाज, संस्कृति न छोड़ने की अनुशंसा तो करती ही हैं, साथ ही प्रेम और आनन्द का पक्ष भी लेती हैं ।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि श्वेतांशु प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित यह 104 पृष्ठीय, 58 अनेक सामाजिक विषयों को छूती हुयीं रचनायें पठनीय और श्रवणीय हैं ।

200 रु. निर्धारित मूल्य की यह पुस्तक अनेक दृष्टियों से उत्तम है, क्योंकि अपनी माटी और माहौल के बारे में लिख पाना कोई आसान काम नहीं है।अतः ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि लेखिका का यह प्रयास स्तुत्य ही नहीं अनुकरणीय भी है। थोड़ा सा प्रयास विधा को साधने का और होगा तो निश्चित रूप से अल्पवयसि लेखिका भविष्य की एक अच्छी विचारशील और क्रान्तिकारी लेखों, कविताओं का सृजन कर पायेंगी।
आपके गद्य शैली के लेख लाखों की संख्या लोग पढ़ते हैं साथ ही आपकी पूर्व में प्रकाशित पुस्तकें भी पठनीय रहीं हैं, हमें आशा ही नहीं पूरा भरोसा है कि ये पुस्तक मिट्टी मेरे गाँव की.. बुन्देली भाषा की महक जरूर बिखेरेगी।
लेखिका को सर्वोत्कृष्ट साधना के लिये हार्दिक बधाई!

#गणतंत्र जैन ओजस्वी
आगरा

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।