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शब्दों को एक माला मे पिरोना
उन्हें भावों के धागो मे बांधना
चुन चुन कर विभिन्न रस से जोड़
अपने मन की बात को रखना
किस ने सोचा मैं ये सब कर पाऊँगी
कभी सोचा ना था मैंने भी
की मैं कविता लिख पाऊँगी
धन्यवाद इस कला का जिसने
इतना मुझे सम्मान दिया
शब्दों ने मुझे चुनकर
मुझे इतना मान दिया
स्नेहा धनोतकर, इंदौर
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