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पढ़ा था बहुत प्रेम को पुस्तकों में
गया भूल सब तुमसे मिलने के बाद
नया पाठ्यक्रम था नयी थी कहानी
नहीं काम आया सबक था जो याद
नहीं प्रेम होता लकीरों पे चलना
नया हो फ़साना नयी हो रवानी
अर्पण हो तन मन समर्पित हो जीवन
रहे प्रेम पावन चढ़े हर ज़ुबानी
नयी हो चुनौती और मानक नये हों
नई भूमिका हो कथानक नये हों
तब प्रेम लिखता है नूतन कहानी
जो सदियों तलक़ गायी जाती ज़ुबानी
सुधाकर मिश्रा, महू
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