परिचर्चा- कैसे समृद्ध हो साहित्य का इन्दौरी घराना?

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परिचर्चा संयोजक-
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में चिह्नित इन्दौर का सांस्कृतिक और साहित्यिक सौष्ठव भी अभूतपूर्व है। इस शहर ने हिन्दी कहानी में डॉ. शरद पगारे, डॉ. कृष्णा अग्निहोत्री, कविता में राजकुमार कुम्भज, चंद्रसेन विराट, सत्यनारायण सत्तन सहित अन्य विधाओं में भी देश को गर्वित करने वाले रचनाकार दिए हैं। वर्तमान समय में साहित्यिक राजधानी के रूप में भी इन्दौर प्रसिद्ध है। शहर में श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति जैसी इमारतें जो महात्मा गाँधी के आगमन और हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के आह्वान की गवाही देती है तो हिन्दी हस्ताक्षर बदलवाने में विश्व कीर्तिमान रचने वाले मातृभाषा उन्नयन संस्थान का भी उद्गम भी इन्दौर ही है। साहित्य के इन्दौरी घराने की समृद्धता के लिए शहर के साहित्यकारों को चिन्ता भी रहती है।
इसी कड़ी में मातृभाषा डॉट कॉम द्वारा भविष्य के इन्दौर के साहित्यिक घराने की समृद्धता के लिए आयोजित परिचर्चा में विद्वतजनों ने अपने विचार रखें।

वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकान्त नागर जी के अनुसार, ‘इन्दौर के साहित्य घराने को समृद्ध करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है जैसे सही अर्थ में देश के प्रबुद्ध कवि, लेखकों, आलोचकों, चिंतकों व कलाधर्मियों को अलग-अलग समय पर आमंत्रित कर उनके साथ स्थानीय रचनाकार भी मनन करें, औपचारिक व्याख्यान न होकर गहन विमर्श हो। साथ ही, साहित्य, संस्कृति तथा विभिन्न कलाओं का एक आर्ट सेंटर स्थापित हो, जहां अलग-अलग विधाओं की गतिविधियाँ संचालित हों, एक समृद्ध पुस्तकालय हो। उस केन्द्र की उपयोगिता और लोकप्रियता ऐसी हो कि युवा सृजनधर्मी मेले की तरह उमडें। इसके साथ शहरी रचनाकार सृजन को गम्भीरता से लें, नाम, यश से अधिक चिंता साहित्य के संवर्धन की करें और औपचारिकता से बचें। रचना प्रकाशन के लिए प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था शहर में स्थापित हो। लिखने से अधिक पढ़ने के प्रति रुचि विकसित करें।’

शहर इन्दौर के लेखक मिर्ज़ा ज़ाहिद बेग़ जी के अनुसार, ‘किसी भी शहर के साहित्यिक घराने की समृद्धता के लिए सबसे आवश्यक है कि शहर में साहित्य साधनारत नवांकुरों के पल्लवन और संवर्धन के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित किया जाए, साथ ही, उन्हें अपनी प्रतिभा के प्राकट्य हेतु उचित मंच भी प्रदान किया जाए, जब हम इस कसौटी पर शहर के साहित्यिक क्षितिज का अवलोकन करते हैं तो परिदृश्य बहुत अधिक धुँधला नज़र आता है। कहने को शहर में दर्जनों साहित्य सेवा समितियाँ हैं पर इक्का-दुक्का को छोड़ कर लगभग सभी पर उन तथाकथित साहित्यकारों ने कब्ज़ा जमाया हुआ है, जो साल में एक-दो साहित्य सम्मेलन कर उपस्थित सदस्यों के सामने रचना पाठ कर उनकी वाह-वाही से ही मुदित हो जाते हैं।
यदि हम चाहते हैं कि शहर में साहित्य साधना निरंतर समृद्ध होती रहे, साहित्य की निर्झरिणी निरंतर प्रवाहित रहे, साहित्यिक नवांकुरों के पठन-पाठन और साहित्य साधना के लिए अनुकूलता बने तो हमें उनके वैचारिक परिष्कार के लिए उचित मंच, मार्गदर्शन और परिमार्जन की एक पुख़्ता शृंखला का निर्माण करना होगा। दुर्भाग्य से अभी शहर में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जिससे शहर के साहित्यिक आकाश में नए नक्षत्रों का आसानी से उदय हो। शहर के साहित्यिक घराने की समृद्धता के लिए यह भी आवश्यक है कि बच्चों में न केवल अच्छे साहित्य को पढ़ने की अभिरुचि जागृत की जाए अपितु उन्हें अध्ययन हेतु अच्छा साहित्य भी निःशुल्क उपलब्ध कराया जाए। विद्यालयों के वाचनालयों को समृद्ध और जीवंत कर बच्चों में साहित्य साधना के प्रति अभिरुचि विकसित की जा सकती है। इस कार्य में हमारे गुरुजन महत्ती भूमिका निभा सकते हैं।
साहित्यिक सेमिनारों में उत्कृष्ट साहित्यकारों द्वारा भी नवांकुरों का पथप्रदर्शन कर उन्हें परिष्कृत किया जा सकता है। उदीयमान साहित्य साधकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पुरुस्कृत भी किया जाए।’

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश तिवारी जी के अनुसार, ‘इंदौर समृद्ध, साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा वाला शहर है। देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश के इस सबसे बड़े शहर की साहित्यिक परंपरा बड़ी पुरानी है। इस परंपरा को बनाए रखने और आगे बढ़ाने में यहां के रचनाकारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका बीते कल में भी निभाई और आज भी निभा रहे हैं। साहित्य की लगभग हर विधा में इंदौर का महत्त्वपूर्ण दखल रहता आया है। इस समृद्ध परंपरा को और समृद्ध करने की जहां तक बात है तो यहां की साहित्य जगत की पुरानी और नई पीढ़ी बेहतर तालमेल के साथ इस दिशा में काम करती दिखाई पड़ती है। जिस तरह किसी बोली या भाषा को अधिक से अधिक बोलने से वह समृद्ध होती है, उसी तरह जितना अच्छा रचा जाता और उस पर पाठक से प्रोत्साहन मिलता है, वरिष्ठ जन से मार्गदर्शन मिलता है, उतना ही साहित्य समृद्ध होता जाता है। एक लघुकथाकार के नज़रिए से कहूं तो साहित्य की तेज़ी से लोकप्रिय हुई इस विधा ने आज जो ऊंचा मुकाम हासिल किया है उसमें इंदौर का बड़ा योगदान रहा है। आज भी यहां की नई पीढ़ी के लघुकथाकार अपना श्रेष्ठ से श्रेष्ठ योगदान देने की कोशिश कर रहे हैं।’

समय – समय पर मातृभाषा डॉट कॉम इस तरह के विभिन्न विषयों पर परिचर्चा एवं विमर्श सहित विचार आमंत्रित कर बौद्धिक समृद्धता के लिए प्रयत्नशील रहेगा।

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।