
ढोंग और पाखण्ड पर,करके…प्रबल प्रहार।
सत्य,ज्ञान आलोक से,किए…कबीर सुधार॥
ऐसे फक्कड़ सन्त थे,निर्भय…करते चोट।
हिन्दू,मुस्लिम,पारसी, सबके…काढ़े खोट॥
पत्थर पूजें,बांग दें,इनका…किए विरोध।
सबद,रमैनी पर करें,अगणित…ज्ञानी शोध॥
सन्तप्रवर तुम धन्य हो,हर…कुरीति पर तर्क।
चेत गए सो बन गए,नहिं…चेते सो नर्क॥
#वैकुन्ठ नाथ गुप्त ‘अरविन्द’
परिचय : वैकुन्ठ नाथ गुप्त ‘अरविन्द’ टेलियागढ़ (जिला-फैजाबाद(उप्र) में रहते हैं।आप काफी समय से काव्य रचना में लीन हैं।

