रेल चली भई रेल चली

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रेल चली भई रेल चली
अपनी प्यारी रेल चली
इंजन सीटी जब देता है
लगे ख़ुशी की ठेल चली
रेल चली भई रेल चली..
कोई नानी के घर जा रहा
किसी को चाचू बुला रहा
करके ये, धक्कम पेल चली
रेल चली भई रेल चली..
खेतों के बीच पहाड़ों से
पेड़ों के बीच कतारों से
करवाती सबका मेल चली
रेल चली भई रेल चली..
ये छुक-छुक करती चलती है
मन धुक-धुक, धुक-धुक करता है
मस्ती की रेलमपेल चली
रेल चली भई रेल चली..
जब बीच में स्टेशन आता है
ख़ुशियों की कड़ियाँ जुड़ती हैं
लगता है जैसे बगिया में
अमरप्रेम की बेल चली
रेल चली भई रेल चली..
अपनी प्यारी रेल चली..

सुषमा सिंह,

दिल्ली

परिचय-

नाम : सुषमा सिंह
( विद्यावाचस्पति (मानद) और विद्या सागर (मानद) उपाधियों से विभूषित )
शिक्षा : एम.एस.सी.
संप्रति : भारत मौसम विज्ञान विभाग, लोधी रोड, दिल्ली।
विधाएँ : कविता, गीत, छंद, मुक्तक, महिया, बाल कविताएँ, कहानी, लघुकथा।
विशेष : दूरदर्शन के विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी ।

प्रकाशित संग्रह :
● साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिनिधि बाल कविता संचयन’ में बाल कविताएँ ।
● मधबुन एजुकेशनल (कक्षा 4) में बाल कविता ।
● ‘नन्हा पाखी’ बाल कविताओं का संग्रह
● ‘कच्चा पापड़’ बाल कविताओं का संग्रह

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।