दो मुक्तक

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नज़ाकत समय की समझा करो
नहीं हर एक से उलझा करो
अपरिचित से न हाले दिल कहो
मात्र दो बात कर चलता करो।।१
वैसे तो आवारा बनकर घूम रहे
अंबर धरती उछल उछल कर झूम रहे
जब मित्रों का प्यारा प्यारा साथ मिला
अपनी उनकी गाथा सुनकर झूम रहे।।२
एक सज़ल

गुजर जाएगा ही यह दौर भी।
बंधेगा शीश एक दिन मौर भी।।
कोरोना काल बनकर आ गया
छिन गया अपने मुंह का कौर भी।।
कोंपलें, पत्तियां शाखा दिखी तो
आएगा वृक्ष में कल बोर भी।।
करता जैसा है जो वह भुगतता है
साथ में आता है कुछ और भी।।
आस्था समर्पण श्रद्धा यह कहती
शिव के संग पूजते गणगौर भी।।
मात्र धन से नहीं मिलता है सभी कुछ
जानना होता तरीका तौर भी।।
खड़े शैलेश हो तो एक दिन
मिलेगा बैठने को ठौर भी।।

डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश
वाराणसी

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Sun Jun 13 , 2021
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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।