
जमीं ये आसमान बाकी है
हौसलों की उड़ान बाकी है
जिंदगी कितना तड़पायेगी
मेरे लबों पे मुस्कान बाकी है
सुनो ना जिंदादिली के किस्से
अभी तो पूरी दास्तान बाकी है
कौन डरता है मुसीबतों से यहां
सोचों कि,अभी सुलतान बाकी है
माना कि ज़ख्म नासूर हैं मगर
अभी भी मुझमें जान बाकी है
नाम बनाने की कवायद जारी
बस थोड़ी सी पहचान बाकी है
#किशोर छिपेश्वर”सागर”
भटेरा चौकी बालाघाट

