विकास पुत्र की लालसा में अबला

0 0
Read Time4 Minute, 7 Second

सन 2005 की वो हसी शाम थी।जिस दिन हमारी शादी कुर्सी से हुई आज सोलह वर्ष हो गये लेकिन विकास पुत्र का जन्म नही हुआ ।महिला, माता, बूढे, बुजुर्ग, की दर्द भरी कहानी जो विकास के खोखले दावो की पोल खोलता गंगा तट पर दफन हो गया । क्या कुर्सी के कुमारों एक भी विकास पुत्र पैदा कर पाएँगे?

वैसे कुमारों ने अपनी सेहत और अपने उठने बैठने के तौर तरीके में खूब विकास की है। देखा जाय तो ऊँचे ऊँचे बिल्डिंग बनी, व्यापारियो के ऋण माफ किए गये,म्यूजियम, यौवन की उन्नति के लिए जगह जगह रास लीलापार्क, ओवरब्रिज, पुल पुलिया, सडक, पानी, बिजली लेकिन सबसे जरूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पूरे साम्राज्य में ऐसी विखरी कि आज कुमारो को विनास पुरूष का तगमा लिए फिर रहे हैं। ऐसी शादी का क्या जो विगत सत्रह सालो में एक स्वास्थ्य रूपी स्वस्थ पुत्र पैदा नही कर पायी।रोते विलखते लोग परिजन दर दर ठोकर खाएँ और कुमारो भीडिओ फेसबुक और व्हाट एक के जरिए चंद चाटुकार से भोजन का स्वाद पूछकर विकास का वखान चैनल पर करते रहे ।शहर की राजधानी की नामी गिरामी अस्पताल में मरीज के साथ हैवानियत बालात्कार क्या नही ? मुजफ्फरपुर चमकी, चारा, अलकतरा सेल्टर होम,सृजन ऐसे कई कारनामें है जिसे अब सहने की आदत सी पड़ गयी है।

आज लिखते हुए हाथ कांपते है मगर इस दर्द विदारक घड़ी में कलम को ही हथियार बना लिया हूँ क्योंकि मैं एक वेवश अबला नारी हूँ। बिहार मायका है मेरा और इस मायके की यह दुर्दशा देखकर मैं विवश और रो पडी हूँ । ऐसे न जाने कितने अस्पताल है जिसके उद्घाटन तो हुए लेकिन न दवा है न डाक्टर न सफाई है न व्यवस्था सारी बस किताबो के पन्ने में दब गयी और योजनाओं की पैसा तिजोरियों में आखिर यह बंदरबांट का खेल खेलकर कैसे विकास पुत्र पैदा करेगे।

अब महीने दिन बाद बिहार पुनःबाढ की विभीषिका झेलेगा और उजड़ जाएगी कितने विकास पुत्र, मां के कोख में ही कोशी, कमला, गंडक, गंगा की लहरों में दम तोड़ देंगी। यह सिलसिला आज से नही सदियों से चली आ रही है।प्रत्येक साल दावे होते है लेकिन लाखो की तादाद में लोग प्रभावित होते है।फिर मुआवजे और रिलीफ फंड का ढिंढोरा पीटकर घडल्ले से तिजोरी भरे जाते हैं और विकास पुत्र को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है।

विकास पुत्र पैदा करने के सपने तो हर अबला नारी को दिखाया जाता है लेकिन ऐसी सरकारें या सिस्टम नहीं बना जो विकास पुत्र ही पैदा करे।हां घोटाले पुत्र की फौज खडी है जब घोटाला पुत्र की तादाद बढ़ जाय तो कोई विकासपुत्र की उम्मीद कैसे रखे पक्ष हो या विपक्ष सभी घोटाले में दबे होते है और उसमें दबती है मां की आशाएं बहन का सुहाग और फिर रोज मरता है विकास पुत्र ।
आशुतोष
पटना बिहार

matruadmin

Next Post

जिंदगी जो शेष बची है..

Sun May 23 , 2021
फिज़ा में ना जानें कैसा ये वाइरस आया है जो अदृश्य होकर भी अनगिनत से लोगों की जीवनलीलाओं को काल कवलित कर रहा है। टूट रही हूं चूड़ियां सिसक रही है जिंदगानी मचा हुआ सा है रुदन द्वारे -द्वारे बीत रही है हर रात काली रात के साए में । […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।