टीका कारण

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जिंदगी को यदि सुरक्षित रखना है।
तो दो हाथो की दूरी रखना पड़ेगा।
कोरोना से बचाने के लिए।
वैक्सीन वाला कवच लेना पड़ेगा।।

हम सबको सुरक्षित रहना है।
तो वैक्सीन को लगवाना होगा।
और घर परिवार व समाज में।
नया वातावरण बनाना है।।

एक ही आधार हम सबको।
जिंदगी को जीने का लग रहा है।
संजीवनी वैक्सीन को
अब लगवाना पड़ेगा
और जिंदगी को जिंदा
रखने का सुकून रहेगा।।

जीना मरना विधाता के हाथो में है।
पर कुछ उपाय हमें भी करना होगा।
और दो डोज वैक्सीन के लेकर।
अपनी जिंदगी को बचना होगा।।

हँसता खिल खिलाता रहे
हमारा आपका परिवार तो।
वैक्सीन का टिका लेना पड़ेगा
और घर परिवार में खुशी का
माहौल बनाना पड़ेगा।।

कोरोना की जंग का है
एक ही है शास्त्र।
और वो है वैक्सीन
बस वैक्सीन वैक्सीन।।

अब कोई हनुमान संजीवनी
लेकर आने वाला नहीं है।
अब तो कलयुग के भगवान
वालो की ही वैक्सीन लेना होगा।
और अपने जीवन को सुरक्षित
इस कोरोना से करना पड़ेगा।।

जय जिनेंद्र देव
संजय जैन, मुंबई

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।