कोरोना और देश की अदालतों की सक्रियता

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सरकारें अपने नागरिकों से कई तरह के कर वसूलती हैं और आश्वासन देती हैं कि पैसे का सही उपयोग होगा. मुश्किल यह है कि लोगों के पैसे को सरकार या सरकारें ऐसे खर्च करने लगती हैं जैसे वह पैसा उन्हें विरासत में मिला है और उस पैसे को जैसे चाहें खर्च कर सकते हैं हालांकि पैसे खर्च करने की प्रविधि, प्रक्रिया और वैधानिकता का संविधान और संसद के बनाये कानूनों में विस्तार से उल्लेख है. अपना पैसा समझ कर पैसा खर्च होने लगता है तो इसी से लोकतंत्र पराजित होने लगता है. लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है, और उनकी जिम्मेदारी भी है, कि देश के संसाधनों का नागरिकों की भलाई और विकास के लिए योजनाबद्ध तरीक़े से उपयोग करें. कोरोना संक्रमण की वजह से देश की अर्थ व्यवस्था पिछले एक साल से डगमगायी हुई है और रोज़ एक नई समस्या खड़ी हो जाती है. भूख और कोरोना से इंसान को बचाने की पहली प्रार्थमिकता होनी चाहिए. सैकड़ों करोड़ों रुपए से बनने वाले प्रस्तावित सेंट्रल विस्टा का निर्माण केंद्र सरकार के लिए इतना महत्त्पूर्ण हो गया है कि केंद्र सरकार की हिदायत है कि सेंट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का आवास इस साल के अंत तक बनकर तैयार हो जाए. दिल्ली के रेस कोर्स रोड पर करोड़ों रुपए खर्च कर के प्रधानमंत्री का नया आवास बनाया गया. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री तक उसी आवास में रहते आ रहे हैं. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया है. कोरोना संक्रमण के दौर में जब हजारों लोग चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में मर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार की प्रार्थमिकता सेंट्रल विस्टा का निर्माण है. कई राज्यों के उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ऑक्सीजन के उत्पादन, आवंटन और वितरण की समस्याओं में अपना समय खपा रहे हैं, केंद्र सरकार नए निर्माण पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है. दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाख़िल की गयी है जिसमें अदालत से गुहार लगायी गयी है कि कोरोना संक्रमण के समय में सेंट्रल विस्टा के निर्माण के लिए बसों में भर भर कर दिल्ली के विभिन्न इलाकों से मजदूर निर्माण स्थल पर लाये जा रहे हैं; इससे कोरोना के फैलने की रफ़्तार बढ़ गयी है सेंट्रल विस्टा के निर्माण पर रोक लगाने की मांग की गयी है. दिल्ली की चिकित्सा व्यवस्था पहले से ही कमजोर है; सेंट्रल विस्टा के निर्माण मजदूरों में कोरोना फैलने से कमजोर और अपर्याप्त व्यवस्था और कमजोर होगी. सेंट्रल विस्टा दिल्ली के संसद भवन के आसपास के इलाकों में बनाया जा रहा है इसमें नया संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास , उपराष्ट्रपति का आवास और कार्यालय, केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवालय भवन इत्यादि शामिल हैं. एक खबर के मुताबिक़ लोकसभा भवन में 888 सदस्यों के बैठने की क्षमता होगी और राज्यसभा में 384 कुर्सियां होंगी. अभी, संविधान के मुताबिक़, लोकसभा में 545 सांसद और राज्यसभा में 250 सांसद हैं. नए संसद भवन में सांसदों की बढ़ी हुई बैठने की सीटों का प्रावधान इस आशंका की ओर इशारा करता है कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण पूरा होने के बाद संविधान में संशोधन करके लोकसभा और राज्य सभा में सांसदों की संख्या बढ़ायी जा सकती है. सांसदों की संख्या बढ़ने का सीधा असर संसद में होने वाली बहसों पर पड़ेगा. जितने ज्यादा सांसद उतना ही लचर बहस होगी. कानोंकान यह भी अफवाह है कि सेंट्रल विस्टा और नए संसद भवन में नयी मूर्तियां, नई तस्वीरें, नए प्रतीक लगाए जाएंगे; शायद इतिहास का पुनर्लेखन किया जाएगा भित्तिचित्रों के माध्यम से. कोरोना संक्रमण का संकट है, जरुरत है कि सारे संसाधन कोरोना संक्रमण से लड़ने में और बेरोज़गार हुए लोगों और उनके परिवारों को आर्थिक मदद देने में लगाया जाए. केंद्र सरकार लोगों के संघर्षों को भूल गयी है; यह सरकार पिछले साल के शहरी कामगारों का गांवों की ओर पलायन को भी भूल गयी गयी है. केंद्र सरकार की भी क्या आलोचना करें, वह तो लोगों के द्वारा चुनी हुई सरकार है और चुनी हुई सरकार पांच सालों तक जो चाहे कर सकती है; लोगों को सोचना चाहिए अपने विवेक के बारे में. पिछले साल सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर वकालत की थी कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण को रोक जाना चाहिए और उस पैसे को कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में लगाना चाहिए. केंद्र सरकार ने उनके पत्र को नज़रअंदाज़ कर दिया. अदालतों पर भरोसा करने वाले विधिकर्मियों ने अदालत की तरफ रुख किया. कोरोना संक्रमण की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए सेंट्रल विस्टा निर्माण कार्य को रोकने के लिए इस साल दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की गयी है लेकिन अदालत ने सुनवाई के लिए आगे की तारीख दी है. याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय के इस आदेश के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय गया लेकिन वहां भी यही कहा गया कि जल्दी सुनवायी के लिए उच्च न्यायालय जाएं. इसी दरमियान एक सच यह भी आया कि नए संसद भवन के निर्माण का प्रस्ताव कांग्रेस की सरकार के समय ही विचाराधीन था तो अब कांग्रेस क्यों बोल रही है. अगर ऐसी बात है तो यह कहना वाज़िब लगता है कि एक सरकार के समय अनेक प्रस्ताव आते हैं, अनेक योजनाएं बनती हैं तो बाद में आने वाली सरकार उन्हीं प्रस्तावों और योजनाओं पर अमल करेगी तो फिर लोग नई सरकार क्यों चुनते हैं. सरकार के बहरापन से आज़िज़ आकर लोग अदालत जाते हैं; सेंट्रल विस्टा के निर्माण के विषय में अदालतों का रुख जनहितकारी नहीं दिख रहा है. यह भी हो सकता है कि अदालतों के सामने ऐसे साक्ष्य पेश नहीं किए जा रहे हों जो सेंट्रल विस्टा के निर्माण को रोकने के लिए पर्याप्त हों. इन्हीं दिनों एक विवाद और आया है महाराष्ट्र से जहां महा विकास अघाड़ी सरकार ने विधान सभा सदस्यों के सरकारी आवास के निर्माण के लिए 900 करोड़ रुपए का टेंडर निर्गत किया है. महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी इस योजना का विरोध यह कहकर कर रही है कि सेंट्रल विस्टा का विरोध करने वाले, विधायक आवास का निर्माण ऐसे समय में कैसे कर सकते हैं जब कोरोना संक्रमण इतना फैला हुआ है. महाराष्ट्र की सरकार इस टेंडर का बचाव यह कह कर कर रही है कि विधायकों के हॉस्टल को बीजेपी की सरकार ने गिराया था और विधायकों को किराया भत्ता देने पर काफी खर्च हो रहा है. जो भी हो, कोरोना संक्रमण के दूसरे दौर में अदालतों की सक्रियता काबिलेतारीफ है.

विवेकहीन कार्यपालिका के आगे अदालतों की सक्रियता नागरिकों में उम्मीद जगती हैं. उच्चतम न्यायालय ने पिछले शुक्रवार को एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया है जो ऑक्सीजन के उत्पादन, वितरण और आपूर्ति की योजना बनाएगा और क्रियान्वित करेगा. यह काम तो मोदी सरकार को करना चाहिए. उच्चतम न्यायालय ने एक और आदेश पारित किया कि केंद्र सरकार को दिल्ली राज्य के लिए रोज 700 मेट्रीक टन ऑक्सीजन देना पड़ेगाा. उच्चतम न्यायालय ने यह आदेश देने के बाद केंद्र सरकार को चेतावनी भी दी कि अदालत के आदेश के पालन ढ़िलाई बरतने की सूरत में मानहानि का मुक़दमा चलाया जा सकता है. दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी की वजह से हो रही मौतों को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है. इसके पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली राज्य को ऑक्सीजन आपूर्ति के कई आदेश दिए थे जिसका पालन केंद्र सरकार ने नहीं किया तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने 7 मई को कड़ा रुख अपनाते हुए एक आदेश पारित किया कि केंद्र सरकार न्यायालय के आदेशों का पालन करे अन्यथा अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू होगी. आदेश यह भी है कि ऑक्सीजन ढ़ोने वाली गाड़ियों को सुरक्षा मिले और इन गाड़ियों के लिए सडकों पर बिना अवरोध वाली अलग वीथिका बनायी जाए. हैरत होती है की दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन केंद्र सरकार ने नहीं किया. तो दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के अधिकारियों के ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही शुरू हुई. तो केंद्र सरकार दिल्ली उच्च न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय में चली गयी. उच्चतम न्यायालय ने अवमानना की कार्यवाही को रोक तो दिया लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें दिल्ली राज्य को ऑक्सीजन देने का निर्देश दिया गया था. उच्चतम न्यायालय का रूख भी अब कड़ा हो गया है. एक समय तो उच्चतम अदालत ने केंद्र सरकार के इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि उच्च न्यायालयों की विधिक सक्रियता पर लगाम लगनी चाहिए. दिल्ली और पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 5 मई को केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि कर्नाटक राज्य को 1200 मीट्रिक टन ऑक्सीजन रोज दिया जाना चाहिए. कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस आदेश के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय में अपील में चली गयी. उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के 5 मई के आदेश को उचित बताते हुए केंद्र सरकार को आदेश दिया कि कर्नाटक राज्य को 1200 मीट्रिक टन ऑक्सीजन रोज मिले. . इसी बीच पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय भी सक्रिय हो गया; इसी विषय पर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने माना कि इन दोनों राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्र चंडीगढ़ में कोरोना संक्रमण की स्थिति गंभीर है और केंद्र सरकार को ऑक्सीजन की आपूर्ति अविलंब सुनिश्चित करनी होगी. पंजाब राज्य के महाधिवक्ता ने उच्च न्यायालय को बताया कि राज्य को 300 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरुरत है लेकिन केंद्र सरकार ने 227 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का आवंटन किया है लेकिन वह भी नहीं पहुंचा है. हरियाणा राज्य के महाधिवक्ता का भी यही कहना था कि हरियाणा राज्य को आवश्यकता के अनुसार ऑक्सीजन नहीं मिल रहा है.

कोविड 19 विश्व महामारी के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश काफी सख्त था. अदालत ने भारतीय चुनाव आयोग पर अपनी नाराज़गी का इज़हार करते हुए यह दोष लगाया कि आयोग ने तमिलनाडु और पोंडिचेरी के विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पालन कराने में असफल रहा और तमिलनाडु और पोंडिचेरी में कोविड के दूसरे चरण के प्रसार का दोषी है. मद्रास हाई कोर्ट के तेवर को देखते हुए इन राज्यों के चुनाव अधिकारियों को निर्देश जारी किया गया कि चुनाव जीतने के बाद विजय समारोह नहीं होगा. मद्रास हाई कोर्ट ने सुनवायी के दौरान भारतीय चुनाव आयोग पर कुछ मौखिक टिप्पणियां भी की जो कि आदेश में शामिल नहीं थीं लेकिन मौखिक टिप्पणियों को मीडिया ने प्रचारित कर दिया. अदालत की मौखिक टिप्पणियां यही थीं कि राज्य में कोविड 19 के बढ़ते संक्रमण के लिए चुनाव आयोग जिम्मेवार है और इसलिए हत्या के केस आयोग के अधिकारीयों के खिलाफ़ दर्ज़ होना चाहिए. भारतीय चुनाव आयोग को अदालत की मौखिक टिप्पणियों के मीडिया में कवरेज से एतराज हुआ. चुनाव आयोग इस आशय का अपील लेकर सुप्रीम कोर्ट गया इस गुहार के साथ कि मौखिक टिप्पणियों के मीडिया कवरेज पर रोक लगायी जाय और आयोग के किसी भी अधिकारी के ख़िलाफ़ पुलिस प्रार्थमिकी दर्ज़ न हो. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के उस अनुरोध को ठुकरा दिया कि मौखिक टिप्पणियों की मीडिया रिपोर्टिंग नहीं की जाय. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अदालत की कार्यवाही के दौरान मौखिक टिप्पणियां और न्यायाधीशों और वकीलों के बीच हुए जवाब सवाल भी बोलने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के दायरे में आता है. ऐसी रिपोर्टिंग पर शक करने के बजाय इसका उत्सव मनाया जाना चाहिए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोविड 19 के दूसरे चरण के संक्रमण के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार को लताड़ा और राज्य में पंचायत चुनाव के दौरान चुनाव कर्मचारियों के कोविड से मरने की खबरों का संज्ञान लिया और सरकार के मनमाने रवैया की भर्त्सना की और कहा कि जितनी भी मौतें हुई हैं उनका रिकॉर्ड तैयार होना चाहिए. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऑक्सीजन के अभाव में हो रही मौतों को जनसंहार से तुलना करते हुए कहा कि हम अपने लोगों को इस तरह मरते हुए नहीं छोड़ सकते. गुजरात हाई कोर्ट स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका पर सुनवायी करते हुए गुजरात की सरकार को कोविड प्रबंधन की असफलता के लिए लताड़ा राजस्थान हाई कोर्ट में भी एक जनहित याचिका दायर हुई थी जिसमें अदालत से दरख़्वास्त किया गया था कि राज्य में जरुरी दवाओं, इंजेक्शन और ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करवाई जाय.राजस्थान हाई कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए कोविड 19 के दूसरे चरण के संक्रमण को रोकने और मरीज़ों की जिंदगी बचाने के लिए जरुरी मेडिकल सामग्रियों का इंतजाम करने का निर्देश जारी किया. तेलंगाना हाई कोर्ट में कई जनहित याचिकाएँ दायर थीं उन पर सुनवायी करते हुए अदालत ने तेलंगाना सरकार को आदेश दिया कि राज्य में रोज़ एक लाख कोविड टेस्ट हों. कोर्ट ने यह भी पूछा कि राज्य में इतने कम टेस्ट क्यों हो रहे हैं तो राज्य सरकार का जवाब यह था कि लोग टेस्ट कराने टेस्टिंग केंद्रों पर नहीं आ रहे हैं. हाई कोर्ट राज्य के इस उत्तर से सहमत नहीं हुआ और राज्य को आदेश दिया कि एक लाख टेस्ट रोज़ हों. कोविड 19 को लेकर जिस तरह अदालतें सक्रिय हुई हैं उम्मीद जगती हैं लेकिन अफ़सोस भी होता है कि सरकारें अपने दायित्व के निर्वहन में चूक रही हैं जोकि लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.
मिथिलेश श्रीवास्तव
(लेखक चर्चित कवि और राजनीतिक सामाजिक विश्लेषक हैं)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।