सिलबट्टा

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ःःमुझसे शादी करोगी ’’
एक दम सपाट प्रश्न था जिसकी उम्मीद किसी को नहीं होती मुझे तो बिल्कुल भी नहीं थी क्योंकि मेरा उसस कोई ऐसा सम्पर्क या सम्बन्ध भी नहीं था । हल्का-फुल्का हलो हाय ही होता था । यह भी बहुत दिनों बाद शुरू हुआ था । कालेज के पहले दिन मेरी नजर जब उस पर पड़ी थी तो मुझे आश्चर्य हुआ था ‘‘अच्छा अपने देश में भी ऐसे लोग होते हैं’’ मैंने मन ही मन में सोचा था । एक दुबली पतली काया, सांवला रंग, व्यक्तित्व सामान्य, किसी मिट्टी के ढेर पर जबरन सिलबट्टा रख दिया हो ऐसा चेहरा । मेरे चेहरे पर मुस्कान नहीं आई थी पर सोचने का अवश्य मजबूर हुई थी । मैंने उसे अनदेखा कर दिया था । कालेज में वह सबसे पीछे बैठता था शायद उसे भी क्षेंप होती होगी । पर पढ़ने में होशियार था । पहले ही सेमिस्टर में जब वह सबसे अधिक अंक लेकर पास हुआ तो सारे लोगों की धारणा ही बदल गई । जो लोग उससे दूर भागते थे वे उसके पास आने को तरसने लगे । क्लास में उसकी सीट भी बदला गई थी अब वह सबसे आगे वाली सीट पर बैठता था । उसकी एक अच्छी बात और थी कि वह सभी की मदद करता था । सेमिस्टर में सबसे कम अंक लाने वाले छात्र की मदद का भार उसने स्वंय उठा लिया था । उसकी इस मदद का ही परिणाम था कि वह छात्र भी बेहतर अंक लाने लगा था । वैसे उसका वास्तविक नाम तो सुजीत था पर वह कालेज में सिलबट्टा के नाम से मशहूर होता जा रहा था ।
कक्षा में प्रवेश करते ही वह सबसे पहले मेरे ही पास आता था और मधुर आवाज में ‘‘हलौ’’ कहकर अपनी सीट पर बैठ जाता था । इसका यह क्रम निरंतर चल रहा था । मैने कभी उसकी हलौ का जबाब नहीं दिया था । दरअसल मैं उसे ज्यादा भाव नहीं देना चाहती थी ।
कालेज के वार्षिक समारोह में मुझे न चाहते हुए भी उसके साथ एक प्ले करना पड़ा । वह कृष्ण की भूमिका में था और मैं मीरा बनी थी
‘‘ हे कृष्ण अगर आप अब भी मेरे सामने नहीं आये तो मैं यह जहर का प्याला पी लूंगीं ।’’ मेरी आंखो से आंसूओं को बह जाना था, वो बहने के लिए तैयार भी थी पर तभी कृष्ण के रूप में सुजीत सामने आ गया मेकअप में वह और ज्यादा भोला सा लग रहा था उसे देखते ही उसकी हंसी निकल गई । पर उस पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा उसने पूरे अभिनय के साथ
‘‘ मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूॅ प्रिय’’ जैसे ही कहा वातावरण स्तब्ध रह गया । उसकी वाणी में इतना तेज था कि सारे लोग खामोश हो गये । सकुचा तो में भी गई थी । इस नाटक को उसने पूरी संजीदगी के साथ प्ले किया । कार्यक्रम में उपस्थित दर्शक उसकी अभिनय क्षमता के कायल हो गये थे । मैं भी पहली बार उससे प्रभावित हुई थी । मुझे लगा कि वह वाकई अच्छा व्यक्ति है, उसके पास भले ही शक्ल-सूरत आकर्षक न हो पर सरस्वती माॅ की असीम कृपा उस पर है । मेरी धारणा उसके प्रति बदल गई थी । अब मैं उसके हलो के जबाब में हलो कहकर मुस्कान बिखरने लगी थी ।
कालेज में अंतिम वर्ष के छा़त्रों के लिए विदाई समारोह का आयोजन किया गया । सुजीत को गाने के लिए बुला लिया गया था इस उम्मीद के साथ कि वह गाना नहीं गा पायेगा अैर हम सब उसे शर्मिंदा होते हुए देखेगें । पर सुजीत ने बगैर हिचकिचाहट के अपनी मधुर आवाज में जैसे ही गाना शुरू किया तालियों की गडगड़ाहट से सारा हाल गूंज गया । उसकी आवाज में एक कशिश थी जो माधुर्यता घोल रही थी । मैं भी बहुत देर तक ताली बजाती रही थी । कार्यक्रम के बाद मैने उसको बधाई भी दी । सुजीत बहुमुखी प्रतिभा के रूप में अपनी धाक जमा चुका था । मेरी उससे बोलचाल शुरू हो चुकी थी । जरूरत पड़ने पर मैं उससे मदद भी ले लिया करती थी । उसने मुझे परीक्षा के लिए नोट्स भी बना कर दिए थे ।
परीक्षा के दौरान भी वह मेरी तैयारियों पर मुझसे चर्चा करता रहता था और सुझाव भी देता रहता था । वह अपना प्रश्नपत्र जल्दी हल कर बाहर मेरी प्रतीक्षा करता नजर आता । जब मैं परीक्षाहाल से निकलती तो वह लपक कर पास आ जाता और एक-एक प्रश्न के हल पर चर्चा करता वह यह अनुमान लगाता कि इस प्रश्नपत्र में मुझे कितने अंक मिल सकते हैं । कालेज के अंतिम पेपर के बाद भी वह मुझसे मिला था और सीधा ही प्रश्न कर दिया था
‘‘मुझसे शादी करोगी’’ उसका चेहरा सपाट था । पर मैं हतप्रभ थी ।
‘‘शादी…….और तुमसे………तुमने सोच भी कैसे लिया….’’ गुस्से से मेरा चेहरा लाल होता जा रहा था ।
वह मौन था ।
‘‘नहीं……..कभी …..नहीं……..फिर कभी मेरी निगाह के सामने आना भी नहीं’’
कहकर मैं लौट पड़ी थी । वह बहुत देर तक मुझे देखता रहा था शायद । मुझे बार बार गुस्सा आ रहा था कि आखिर उसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि वह मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखे ‘‘सिलबट्टा’’ कहीं का । ‘‘सिलबट्टा’’ होता ही इसके लिए है चटनी पीस लो मसाला पीस लो और दीवार से लगा कर टिका दो । वैसे अम्मा तो दीपावली पर सिलबट्टा की भी पूजन करती कहती ‘‘सिलबट्टा’’ पर पिसी चटनी बहुत स्वादिष्ट लगती है, तुम्हारी यह मिक्सी भला ऐसी चटनी क्या पीसेगी । अम्मा को सिलबट्टा बहुत पसंद था और मुझे अपने कालेज के सिलबट्टे की वजह से नापसंद ।
समय अपनी अबाध गति से गुजरता गया । मैं धीरे-धीरे उस घटनाक्रम को भूलती चली गई । ‘‘सिलबट्टा’’ जरूर याद आ जाता और मेरे चेहरे पर एक मुस्कान खिल जाती । मैं शादी किसी पैसे वाले हैंण्डसम से नौजवान से करना चाहती थी । इस कारण कई लड़कों को रिजेक्ट करना पड़ा । मैं जब भी किसी लड़के को रिजेक्ट करती उसे ‘‘सिलबट्टा’’ का सम्बोधन ही देती । अंत में मेरी शादी मेरी मनपसंद से हो भी गई । ‘‘सिलबट्टा’ अब मेरी जिन्दगी से पूरी तरह निकल चुका था । हांलाकि सिलबट्टा याने सुजीत मुझे कालेज के बाद कभी नहीं मिला था और न ही मुझे उसके बारे में कोई जानकारी थी कि वह कहां है, क्या कर रहा है ‘‘किसी छोटी-मोटी नौकरी में लग गया होगा’’ मैं ऐसा ही मानती थी । उस जैसे लोगों के लिए ये ही काम बचे हैं नहीं तो पान की दुकान खोल लो और दिन भर चकचक करते रहो ।
‘‘सिलबट्टा’ वर्षों बाद एक समारोह में उससे मुलाकात हुई । वह अभी भी वैसा ही था पर अब वो ऊंचे ओहदे पर पहुंच गया था । वैसे तो मैं ज्यादा कहीं आती जाती नहीं थी पर पति देव के बड़े साहब के सम्मान में कार्यक्रम रखा गया था सो जाना पड़ा । कार्यक्रम के सारे अतिथि आ चुके थे पर साहब अभी तक नहंी आये थे सारे लोग उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे । ‘‘साहब आ गए’’ की आवाज आते ही सारे लोग अपनी-अपनी सीट से उठ कर खड़े हो गए । नया शानदार सूट, चेहरे पर चश्मा और गले में टाई पहने जिस व्यक्ति ने हाल में प्रवेश किया वह पहली नजर में मुझे जाना पहचाना सा लगा । मैं ठीक ठीक उसे पहचान नहीं पा रही थी । कार्यक्रम का संचालन उसके पति ही कर रहे थे, जिन्होने उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए बताया कि कैसे इन्होने कम उम्र में ही उंचाईयों को हासिल किया है ।
उसका स्वागत सत्कार किया गया । वक्ताओं ने भी उसकी बहुत तारीफ की । मुझे वह जाना पहचाना जरूर लग रहा था पर मैं पहचान नहीं पा रही थी । पर जब वह बोलने खड़ा हुआ तो उसकी आवाज कानों में पड़ते ही मेरे दिमाग ‘‘सिलबट्टा’’ की तस्वीर कोंध गई । एक बार तस्वीर बन जाने के बाद मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि यह सिलबट्टा ही है । उसकी आवाज में वही खनक थी और बातों में गहराई । उसका भाषण जब तक चलता रहा सारा हाल खामोश बन रहा । यही तो उसकी आवाज का जादू था । उसकी धीर गंभीर वाणी के चक्रव्यूह में सब सम्मोहित हो जाते थे ।
मुझे स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी कि सिलबट्टा के साथ मेरी मुलाकात इस तरह से होगी । मेरे मन में उससे मिलने की उत्सुकता पैदा हो चुकी थी । में शायद उसकी ओर आकर्षित हो गई थी । वो मेरे पतिदेव के साहब थे । पतिदेव जिस तरह उनके आगे पीछे घूम रहे थे यह बात मुझे ठीक नहीं लग रही थी पर उनकी अपनी मजबूरी होगी मैंने सोचा । मैं सिलबट्टा ओह……नहीं…………..सुजीत से मिलना चाह रही थी । पर बहुत सारे लोग सुजीत को घेरे हुए थे । सुजीत एक-एक से मिलता जा रहा था उसके चेहरे पर हमेशा की तरह मुस्कान थी । आज यह मुस्कान मुझे बहुत भली लग रही थी ।
मेरे पतिदेव मुझे सुजीत से मिलवाने के लिए ले गए थे । पतिदेव चाहते थे कि उनके साहब याने सुजीत उनकी पत्नी से मिलें ।
‘‘सर……….ये मेरी धर्मपत्नी……मिसेज रागिनी….’’ ।
रागिनी……….नाम सुनते ही सुजीत ने अपनी गर्दन घुमा कर उसकी ओर देखा था………..उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि वह कुछ याद कर रहा है…..उसने एक बार फिर भरपूर निगाह से मेरी ओर देखा
‘‘हलौ……….रागिनी………’’
उसने हलौ ठीक वैसे ही कहा था जैसे कालेज के दिनों में वह मुझसे बोला करता था, तब उसका यूं हलौ कहना मुझे अच्छा नहीं लगता था पर आज मुझे प्रसन्नता का अनुभव हुआ । उसके चेहरे पर अभी भी असमंजस के भाव साफ दिखाई दे रहे थे
‘‘ हलौ………..सर…………मैं रागिनी……….शायद आप ही मेरे क्लासमेट थे….’’
इस बार उसके पतिदेव चैंके । वे इस सबके बारे में एक दम अंजान जो थे । पर अब उनके चेहरे पर तसल्ली के भाव थे ।
‘‘ ओ…….ह………यस….मैं भी कुछ ……ऐसा ही सोच रहा था ……..कैसी हैं…आप’’
सुंजीत अब और सहज नहीं हो पा रहा था ।
‘‘मैं बढ़िया…….हूॅ…..और…..आप’’ मैं चिहुंक सी रही थी ।
‘‘जी…..बेहतर ही ….हूॅ ’’
पतिदेव प्लेट लेने चले गए थे ।
‘‘ मैं …….उस………दिन की बात…के लिए…..आपसे स्वारी भी नहीं बोल पाया’’
वह घटना में दिमाग से गायब हो चुकी थी । वैसे भी यदि वह दिमाग में रही भी आती तो भी उसे आज तो याद नहीं करती ।
‘‘ नहीं……..कोई……बात नहीं………..कालेज के दिनों में ………ऐसा तो होती ही रहता है……..आप छोड़िए …उसे’’ में चाहती थी कि माहौल सहज बन जाए ताकि सुजीत उससे ढेर सारी बात कर सके ं
‘‘ शादी………..बगैरह…..तो कर ही …..ली होगी…….अपनी पत्नी को लेकर नहीं आए कार्यक्रम ….में जैसे मैं आई हूॅ’’ ं वास्तव में मूझे उत्सुकता हो रही थी उसके बारे में जानने के लिए । वह मौन ही रहा ।
‘‘आपने बताया नहीं………..’’
‘‘ जी……….मैंने शादी…….नहीं की…..’’ । उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था इस कारण मैं उसके चेहरे के भावों को पढ़ नहीं पा रही थी ।
‘‘क्यों……………’ स्वाभाविक प्रश्न था । पर मन में अभिलाषा थी कि वह कहे तुम्हारे कारण ।
‘‘बस…..यूॅ ही……..’’ उसने एक मुस्कान जबरन ओठों पर बिखेर ली थी ।
मैंने आगे कोई प्रश्न नहीं किया । उसने शादी नहीं की सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा । सच आज उसकी मुलाकात से मेरा मन अब उसके प्रति आकर्शित हो गया था । उसने जैसे ही कहा कि उसने शादी नहीं की मैं प्रसन्न भी इसलिए हुई थी कि मानो ‘‘मेरी राह अभी भी ख्ुाली हुइ्र है’’ का संकेत हो । ओह……काश उस दिन उसने जो प्रस्ताव मेरे सामने रखा था वह आज रखता ।
‘‘अच्छा…………….चलूॅं…….सुजीत जी’’
‘‘सुजीत……….नही………….मेडम ………..आप सिलबट्टा ही बोलिए…….आपके मुख से वही अच्छा लगता है’’ वह हंस पड़़ा था । उपस्थित सारे लोग हमारी ओर देखने लगे थे ।
मैं देर रात तक सो नहीं पाई थी हर पल सुजीत ही मेरी निगाहों के सामने घूम जाता था । व्यक्तित्व का निर्माण शरीर से नहीं आतंरिक प्रतिभा से होता है । पर यह सब समझने में मैं देर कर चुकी थी ।
‘‘सिलबट्टा………कहीं का……..’’

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
जिला-नरसिंहपुर म.प्र.

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।