हरियाणा के मोहम्मद रफी श्री राजकिशन अगवानपुरिया

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राजकिशन अगवानपुरिया हरियाणा के एक महान लोक गायक हैं इनका जन्म 8 सितंबर 1957 को सोनीपत के गांव अगवानपुर में हुआ। यह बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे थे। राजकिशन एक सरल स्वभाव के व्यक्ति और सबके मिलनसार व्यक्ति थे उन्होंने हरियाणवी मां बोली की सेवा पूरी उम्र की और उन्होंने हरियाणा की संस्कृति को एक नया जन्म दिया इन्होंने हरियाणा का मोहम्मद रफी भी कहा जाता है क्योंकि हरियाणा की संस्कृति पूरे संसार में विख्यात है बहुत ही विस्तृत है और केवल एक ही यहां की संस्कृति ऐसी है जिसमें वेद शास्त्रों से ज्ञान कराती है पुरानी कहानियां कि इस स्थिति में देन है इसमें बोली में लिखने वाले लख्मीचंद बाजे भगत मेहर सिंह मांगेराम और भी बहुत सारे कवि है और उन्हें की कल्पनाओं को श्री राजकिशन अगवानपुरिया जी ने अपनी आवाज बनाई और पूरे संसार में आप ने धूम मचाई। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम सन 1971 में पाले पाले राम बाऊ राम दहिया के साथ किया था और सोनीपत के पास गांव जगदीशपुर में उन्होंने पहला कंपटीशन जीता था। और इस महान कलाकार ने गांव की पावन धरती अगवानपुर में जन्म लिया और एक बार इनकी टक्कर बॉलीवुड के गायक मोहम्मद रफी के साथ हुई यह टक्कर दिल्ली में हुई थी। दोनों को सुनने वाले बहुत ज्यादा थे और दोनों का रिजल्ट बराबर का रहा तब से इसको हरियाणा का मोहम्मद रफी कहने लगे। इन्होंने 1980 में फौजी मेहर सिंह की रागनी करके घाल तड़पती छोड़ी गाकर बहुत नाम कमाया उसके बाद सतपाल फौजी ने खुद की फौजी कैसेट कंपनी में इन्होंने बहुत सारी रागनियां गाई उसके बाद दिल्ली के मैसूर कैसेट मैक्स कैसेट कंपनी ने भी इसको गाने का न्योता दिया और उसके अंदर 50 के करीब किससे गाये। फिर धीरे-धीरे उन्होंने रामा कैसेट, मैना कैसेट, जगदीश कैसेट मैं भी  रागनियां गायी। एक समय का जिक्र है की इन्होंने रागिनी गाने का शौक बचपन से ही था और यह एक ऐसा गांव है जहां पूरे का पूरा गांव रागिनी गाने वाला इस गांव में कोई भी बच्चा, बुढा, जवान रागिनी से परे नहीं है। इन्होंने रागनी गाड़ी की शुरुआत विद्यालय स्तर में बाल सभा से की थी जब भी हर शनिवार को बाल सभा होती थी तो राजकिशन उस बाल सभा में कुछ ना कुछ सुनाता था। बाल सभा में सुनाने वाले को पेंसिल रबड़ का इनाम दिया जाता था और यह कभी भी इनाम लेने से पीछे नहीं हटता था कभी-कभी तो पूरे का पूरा डिब्बा इनाम का ले आता था और वहीं से इसने रागिनी गाने की शुरुआत की राजकिशन जी 6 भाई है और यह दूसरे नंबर पर थे‌ । बाल सभा में यह कविता भी मटके पर सुनाते थे।
यह हमेशा शुद्ध गाते थे और जब यह कहते थे तो इन को किसी प्रकार की माइक या साउंड सिस्टम की जरूरत नहीं होती थी। इनकी आवाज इतनी अच्छी थी थी अगर दस हजार व्यक्ति इसके कार्यक्रम को सुनने आते हैं तो हर व्यक्ति को इस की आवाज साफ-साफ सुनाई देती थी। यमुना स्पोर्ट्स क्लब के बहुत बड़े फैन थे वह खो खो कबड्डी ही खेलते थे जो इसके साथ वाद्य यंत्र बजाने वाले थे उनमें रामशरण, देवी राम, रणबीर, हरजीत, विजेंदर रामकुमार आदि थे‌। अगवानपुर गांव एक ऐसा गांव है अगर कोई भी व्यक्ति कहीं उस गांव का चला जाता है तो उससे पूछते हैं कि आपके गांव का क्या नाम है तो वह कहता है कि मेरा गांव अगवानपुर है तो उसको कहते हैं कि तूने तो दो या तीन रागनी सुनाएं बगैर नहीं जाने देंगे ऐसे ऐसे ही गांव के महान हस्ती है और इस मां बोली की सेवा करने के लिए आज उनके सुपुत्र श्री दीपक अगवानपुरिया इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं और वह कहते हैं कि मैं मेरे पिता जैसा तो 2% भी नहीं गाता हूं अगर मैं 2% गाता हूं तो मैं बहुत बड़ा व्यक्ति हूं। बताते हैं कि कुछ वक्त राजकिशन अगवानपुरिया जी के बराबर के गाने वाला कोई नहीं था एक वक्त तो ऐसा आ गया था की जहां राजकिशन अगवानपुरिया जाते थे वहां दूसरा गायक नहीं जाता था क्योंकि उसको सुनने वाले बहुत ज्यादा थे। आज की युवा पीढ़ी ने चाहे उस महान हस्ती को देखा हो या ना देखा हो लेकिन उसकी आवाज के आशिक है प्रेमी है उन्होंने उनके गांव के पुलिस इंस्पेक्टर के ऊपर भी एक रागनी बनाई थी जब वह कहते हैं ऐसा लगता है जैसे मां सरस्वती दिल के अंदर समा गई हो।
वह शरीर से पतले थे पर आवाज के धनी थे उन्होंने इस मां बोली कि सेवा 20 साल से ज्यादा की और इन्होंने हरियाणा के अंदर और दिल्ली में टिकटों से रागिनी गाने शुरू की थी और इनके नाम पर रागिनी गाई जाती थी और कहा जाता था कि एक रात्रि राजकिशन के नाम उस वक्त राजकिशन लाइट होती थी और उस कार्यक्रम में बहुत लोग इसके रागिनी सुनने के लिए आते थे और टिकट भी हासिल करते थे। इनकी रागनी ऐसी थी कि पूरा परिवार बैठकर सुन सकता है उस वक्त के रागिनी गायक मास्टर सतबीर भी मशहूर थे। इनके विद्यालय के गुरु लखीराम जी ने रागिनी गाने के लिए प्रेरित किया था और आठ साल रागिनी गाने के बाद उन्होंने जगन्नाथ समचाना वाले को अपना गुरु धारण किया। जो भी है दिल्ली रेल में जाते थे तो माचिस पर रागनियां गाते थे माचिस को बजाते थे और उस वक्त मैं आप सब को बता देता हूं की जहां भी मेला होता था उन मेलों में राजकिशन अगवानपुरिया जी रागिनी गाने जाते थे उस वक्त इतनी संचार क्रांति तो नहीं थी फिर पूरा हरियाणा और पड़ोसी राज्यों से लोग उन मेलों में आते थे और राजकिशन अगवानपुरिया की रागनी सुनते थे। एक बार उन्होंने जब आकाशवाणी रोहतक मैं कार्यक्रम मिला तो उन से कहा कि आप अपने रागिनी पक्के साज पर गाएंगे तो उन्होंने कहा आप पक्के साथ पर गवांऐ  या कच्चे साज पर उसमें मटका और बैंजो जरूर होगा। उस वक्त से आकाशवाणी में भी मटका बंजू पर रागनियां गानी प्रारंभ हो गई। यह आवाज के बहुत धनी थे ‌।एक बार का जिक्र है झज्जर से कुछ दूर गांव पर उन्होंने रागिनी गाने जाना था वह गए भी मूसलाधार बरसात की वजह से वह उस गांव में है रात के करीब 12:00 बजे पहुंचे उस वक्त तक उसको सुनने वाले गांव वापस जा लिए थे लेकिन जब उन्होंने रागिनी गाने शुरू की तो पूरा गांव जगा दिया और पूरा गांव उठकर उसकी रागनी सुनने के लिए आ गए। वह कार्यक्रम उसने सुबह 9:00 बजे तक किया। एक बार वर्जीम जिले के गांव जामिनी में भी गए वहां उन्होंने मदन सेन का किस्सा सुनाया। उन्होंने पास के राजलू गढ़ी गांव से दसवीं पास की वह बिल्कुल साधारण परिवार से थे और आप भी सरल और साधारण व्यक्ति थे सब से मिलने वाले व्यक्ति थे उन्होंने उस वक्त के जितने भी कवि हुए हैं सब की रागनियां गाई। राजकिशन जी ने 5000 से ज्यादा रागनियां अपने मुख की सुनहरी आवाज से लोगों के बीच में सुनाई हैं और सभी के सभी लख्मीचंद के किस्से, जाट मेहर सिंह के किस्से, मांगेराम के किस्से, दयाचंद के किस्से, रामस्वरूप सीटावली वाले के किस्से, सूरजमल के किस्से लिखे हुए को अपनी आवाज दी है। उन्होंने करीब 50 किस्से सुनाएं हैं। जिनमें सत्यवान सावित्री, हरिश्चंद्र, पद्मावत, चंद किरण, नल दमयंती, अजीत सिंह राजबाला, सेठ ताराचंद, शिव विवाह, महाभारत, कृष्ण जन्म, बीजा सोरठ, अंजना पवन, नरसी का भात आदि किस्सों को अपनी आवाज दे चुके हैं इस महान व्यक्ति का हमने दिल की गहराइयों से सम्मान करना चाहिए और यह महान गायक श्री राजकिशन अगवानपुरिया जी पेट की नसों में इंफेक्शन होने की वजह से 13 मई 1994 को स्वर्ग सिधार गए हम इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ज्यादा बीमार होने की वजह से उन्होंने अपने दो-तीन साल कार्यक्रम महाशय रणबीर बड़वासनिया को दिए। इस तरह की आवाज देने वाले आज तक हरियाणा में आए नहीं है यह कोई विरला ही व्यक्ति थे। श्री राज किशन जी तीन लड़कियांंंं और एक लड़का है जिसका नाम दीपक अगवानपुरिया है ‌।©®

खान मनजीत भावड़िया मजीद
सोनीपत (हरियाणा)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।