
क्यों अभी से खुद को यूँ संजीदा किया जाए,
क्यूँ न फिर से अपने बचपन को जिया जाए..
चलो आज फिर एक गुड़िया का घर बनाएं,
और सजाएँ उसे फिर नन्हें सपनों के साथ..
फिर से कराएं वो गुड़िया की शादी,
वो नकली घोड़े,वो नकली हाथी..
वो नकली दूल्हा,वो नकली बाराती,
उन गुज़रे कीमती लम्हों को फिर से याद किया जाए
क्यों न आज फिर से बचपन को जिया जाएl
क्यों न बनाएं फिर कागज की कश्ती,
और छोड़ें उसे ठहरे से पानी में..
माना दौड़ रही है ज़िन्दगी,
पर मोड़कर इसे गुजरी यादों का पीछा किया जाए,
क्यों न फिर से बचपन को जिया जाएl
क्यों न आज लेकर उमंग भरी मिटटी,
बनाएं खिलौने कुछ मासूम ख्वाहिशों के..
यूँ तो फ़िज़ूल है भागना ख्वाहिशों के पीछे पर,
क्यों न ज़िन्दगी को एक और मौका दिया जाए..
क्यों न फिर से अपने बचपन को जिया जाएl
वो बारिश में भीगना,
वो दौड़ना नंगे पैर रास्तों पे..
वो नहाना खुली सड़क पे,
वो महसूस करना बारिश की हर बूँद को..
माना बहुत बंदिशें हैं आज ज़िन्दगी में,
पर क्यों न कुछ पल के लिए खुद को आज़ाद किया जाए..
क्यों न अपने बचपन को जिया जाएl
बड़ी भीड़ है ज़िन्दगी में,
कुछ उम्मीदें,कुछ ख्वाहिशें और कुछ हसरतें..
सोचती हूँ आज ज़िन्दगी को कुछ खाली किया जाए,
तो आओ आज ही से अपने बचपन को जिया जाए।
#आशा बुनकर
परिचय : आशा बुनकर का राजस्थान के जमनापुरी(जयपुर)में निवास हैl १९८३ में जन्मीं हैं और जयपुर से शिक्षा बीएड तथा स्नातकोत्तर(हिन्दी साहित्य) सहित हिन्दी साहित्य में ही `नेट` उत्तीर्ण हैं।