तू ही सच में महान है

kirti jayaswal

वीर वो सैनिक तम को हराने,
जाते जिनके प्राण हैं;
जिस मिट्टी से मिल जाते हैं,

वह ही ‘दीप’ महान है।

दीपक तुम जलते जाना,
जगमग जग करते जाना;
जल-जल जितना मरुँ ‘पतंगा’,
जगमग उतना जग होगा।
दीपक तुम जलते जाना,
तुझमें आकर मर जाऊंगा।

भानु चमकता जगमग जग में,
तारकगण आकाश में;
प्रेम-तेरे बिन जो न जलता,
वह ही ‘दीप’ महान है।

शशक रूप; शिशु रूप लिए,
‘घन’ नभ में हैं; विस्तार में;
तड़िक-वज्र से वार किया,
इन मूकों पर तूफान ने।

अंधकार का कारण क्या ?
कुछ और नहीं तूफान है;
जगमग जग जो रोशन करता,
दीप भी एक शिकार है।
बड़े भयंकर वृक्ष गिराया,
खंभ,गेह भी है मथ डाला;
वृक्ष मथे थे; खंभ मथे थे,
गेह मथे तूफान ने।

अभी-अभी अंकुर से आया,
पौधा बन जो नम्र खड़ा है;
वृक्ष हैं टूटे; खंभ हैं टूटे,
धावित नर हैरान हैं।
खड़ा नम्र से नम्र बना दे,
वह ही बड़ा महान है।

भूत भयानक तम में होते,
वृक्ष दिवस जो ‘यार’ हैं;
गुह्यतम से जो रस ले आती,
डसती तम; क्या राज है ?

ऊँट पर नर ‘मरू’ में खोजें,
और भौंरे पुष्प के बाग में;
चीर जो गिरि से लाता ‘रस’ को,
वह ही ‘कुटज’ महान है।

सूरत पर एक मुस्कुराहट,
खिलती तभी हजार हैं;
‘कली’ भली तू खिलती प्रांतर,
तू तो बड़ी नादान है।

उड़ते शुक हैं; काक-विहग है,
ऊंचाई पर बाज हैं;
पंगु पैर ले जो उड़ जाता,
‘बगुला’ वही महान है।

जुगनू-सा तारक जगमग जग,
नजर फेरे ‘अज्ञान’ है;
विभा भानु से ले जो जगमग,
‘चंद्र’ वह बड़ा महान है ?

पंछी नभ में; वायुयान भी,
ख्वाब भी हैं आकाश में;
उच्च विचार जो कर्म में परिणित,
वह ही उच्च,महान है।

व्याल न होकर डस जाता है,
व्याघ्र न हो जो गुर्राता;
तूफानों सा जकड़-पकड़ता,
कौवे-सी जबान है।
बनकर दानव बैठा ‘मानव’,
या उसका सम्राट है ?
हे नर! तेरे रुप अनेक,
तू ही सच में महान है॥
(शब्दार्थ:शशक-खरगोश,तड़िक-आकाश बिजली,व्याल-साँप,व्याघ्र-बाघ एवं गुह्यतम-छिपा हुआ)

 कीर्ति जायसवाल
इलाहाबाद(प्रयागराज)

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