लेखन की कशिश से निखर गए डॉ काज़ी

साक्षात्कार- डॉ वासिफ काज़ी के साथ प्रिंस बैरागी का

लेखन की कशिश से निखर गए डॉ काज़ी

प्रिंस बैरागी

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एक मुलाक़ात ऐसे शख्स के साथ जिन्होंने हिन्दी-उर्दू समन्वय के साथ अपनी रचनाओं को पाठकों के मन पर अंकित करने में सफलता अर्जित की है। मालवा की धरती के सुकुमार शायर, कवि व साहित्यकार डॉ. वासिफ़ काजी मध्यप्रदेश के बड़वानी में जन्में व धार जिले की तहसील कुक्षी में अध्यापन कार्यों के साथ साहित्य क्षेत्र में आए है । वर्तमान में इंदौर में निजी महाविद्यालय में प्राध्यापक है ।इनकी साहित्य में बचपन से ही रूचि रही है, और अध्यापन कार्यों से जुड़े होने से लगातार कई पत्र पत्रिकाओं, मातृभाषा.कॉम आदि पर इनकी रचना प्रकाशित होती रहती है । अब तक डॉ काज़ी की चार किताबें आ चुकी है, पांचवी किताब ‘कशिश’ भी पाठकों के बीच पहुंच रही है।
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डॉ वासिफ़ काज़ी का व्यक्तित्व दर्पण
जन्मतिथि 5 अगस्त,1981
माता श्रीमती शमा क़ाज़ी
पिता स्व बदरूद्दीन क़ाज़ी
पत्नी श्रीमती शबाना क़ाज़ी
जन्मस्थली बड़वानी ,म.प्र.
प्रारंभिक शिक्षा ( विद्यालयीन)
       कुक्षी-नगर, जिला धार, मप्र
उच्च शिक्षा ( महाविद्यालयीन)
     कुक्षी, बड़वानी एवं इंदौर
शैक्षणिक योग्यता
* एम. ए .( हिंदी , अंग्रेजी(साहित्य )
*एम.एस-सी.( कार्ब.रसायन)
विशिष्ट योग्यता
पी-एच.डी.शोधप्रबंध कार्य पूर्ण
शोध का विषय – “हिंदी काव्य एवं कहानी की, वर्तमान सिनेमा में प्रासंगिकता ।”
कार्यक्षेत्र
अध्यापन ( व्याख्याता) ,कवि, फिल्म समीक्षक एवं स्वतंत्र स्तंभकार
काव्य कृतियां ( रचनाकार के रूप में )
संकल्पना – मार्च 2018
आग़ोश – मई 2018
अदीब – सितंबर 2018
परस्तिश – जनवरी 2019
कृतित्व कौशल / साहित्यिक उपलब्धियां
-संभाग स्तरीय महाविद्यालयीन वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान  (अप्रैल 2001)
-जिला स्तरीय भाषण प्रतियोगिता में प्रथम स्थान ( जनवरी 2002 )
*राज्य स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान
( अक्टूबर 2005 )
-भाषा सारथी सम्मान ( फरवरी 2018 )
-भाषा गौरव सम्मान ( सितंबर 2018 )
 -मातृभाषा उन्नयन सम्मान ( जनवरी 2019 , विश्व पुस्तक मेले, दिल्ली में )
-अंतरा गौरव सम्मान ( जनवरी 2019 )
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 डॉ वासिफ़ काज़ी के साथ खबर हलचल न्यूज के प्रदेश संपादक प्रिंस बैरागी की खास बातचीत,  तो आइये जाने-
*लेखन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिलती है?
डॉ काज़ी: मन में अनग़िनत अहसास जन्म लेते हैं,अहसासों की ज़बान नहीं होती, तो उन्हें अल्फ़ाज़ों में सामईन के सामने रखता हूं । आपका मन , आपके ख़्यालात आपको प्रेरित करते हैं ।
*कविताओं के अलावा साहित्य की और किस विधा में आपकी कलम यात्रा करती है?
डॉ काज़ी: वैसे काव्य, मेरी पसंदीदा विधा है परंतु इसके अतिरिक्त निबंध, समीक्षा लेखन पसंद है ।
*चूँकि आप कवि/ शायर हैं अतः लेखन से जुड़े किसी यादगार वाकये की किस्सागोई साझा करें।
डॉ काज़ी: चूंकि न मैं शायर हूं और न ही कवि, क्योंकि यह दोनों बनने के लिए शब्दसागर बनना पड़ता है और मैं तो महज एक दरिया हूं अल्फ़ाज़ों का  ।
जहां तक सवाल यादगार लम्हे का है तो कालेज में एक बार मुझे कविता कहने को कहा गया , तैयारी थी नहीं लेकिन फ़ूल शब्द पर जब कुछ अपना लिखा सुनाया तो स्वयं प्राचार्य आर एल गर्ग सर ने पीठ थपथपाई । तब लगा कुछ लिख सकता हूं ।
*इसके अलावा आपकी अन्य प्रकाशित रचनाओँ के बारे में बताएँ।*
डॉ काज़ी: संकल्पना मेरी प्रथम पुस्तक थी जब मेरा रचनाकार के रूप में किताब पर नाम प्रकाशित हुआ । फिर  आग़ोश , अदीब और परस्तिश के रूप में काव्य यात्रा दिल्ली तक पहुंच गई।
*नज़्म लेखन आपके लिए कितना सहज है और इस पर आपकी व्यक्तिगत राय क्या है ?*
डॉ काज़ी: देखिए , लेखन मुझे लगता है मेरी रगो में है , स्वभाव में है । रहा सवाल नज़्म का तो आप अपनी बात कितने आसान लहज़े में कहते है यह ज़रूरी है । भारी भरकम हिंदी उर्दू के अल्फाजों का ज्यादा इस्तेमाल, सभी पाठकों के समझ नहीं आता। लेखन का अपना दायरा होता है । तुकांत,छंद,लय सब पर काम करना होता है
*चूँकि आपके लेखन के मूल में प्रेम है, आपके अनुसार प्रेम की परिभाषा क्या है ?*
डॉ काज़ी: प्रेम ही शाश्वत है,अजर अमर है ।
नश्वर जीवन का कटु सत्य प्रेम है।
मेरे अनुसार – आप को स्वयं से जोड़े रखने वाला प्रेम ही तो है । आप स्वयं से नफ़रत नहीं कर सकते तो दुनिया में नफ़रत क्यों फैलाते हो।
*साहित्य को आप अपने तरीके से कैसे परिभाषित करते हैं?*
डॉ काज़ी: जो समाज के जर्जर, उपेक्षित, सर्वहारा वर्ग की दारूण पीड़ा को समाज के सामने रखे और मानवीय मूल्यों को बल दे, वही साहित्य प्रेरक है।
*हिंदी साहित्य का भविष्य आप कैसा देखते हैं?*
डॉ काज़ी: हिंदी हमारे अपनों की भाषा है, हमारे सपनों की भाषा है । हिंदी,हमारा राष्ट्र गौरव है और राष्ट्रीय गरिमा तो दिन दुगनी रात चौगुनी उन्नति करनी चाहिए । हिंदी का भविष्य, युवा रचनाधर्मिता की वजह से हमेशा कालजयी रहेगा।
*लेखन के अलावा आपके शौक में और क्या-क्या शुमार है?*
डॉ काज़ी: लेखन के अलावा मेरे अन्य शौक संगीत सुनना है ,मेरा अनुज अमन क़ाज़ी इंदौर के संगीत जगत का जाना पहचाना नाम है उसका ग़ज़ल गायन, सुकुन देता है
*कुछ बातें अपनी आगामी पुस्तक ‘कशिश’ के बारे में बताएं।*
डॉ काज़ी: क़शिश , कविताओं, नज़्मों और शेर ओ शायरी क़त- आत का संग्रह है । क़शिश में इंद्रधनुषी रंग है , मेरे जज़्बात की अल्फ़ाज़ अदायगी है।
*आपने संस्मय प्रकाशन ही क्यों चुना?*
डॉ काज़ी: मेरी इससे पूर्व चार पुस्तकें , एक अन्य प्रकाशन के माध्यम से पाठकों तक पहुंची लेकिन इस बार पृष्ठों की संख्या अधिक थी और संस्मय प्रकाशन के माध्यम से सुव्यवस्थित प्रचार और ब्रांडिंग के चलते मैंने चुना । वैसे मुझ जैसे नवांकुर को आज बिहार, पुणे में बैठा युवा पढ़ता है तो लेखन को सार्थक समझ लेता हूं।
*मातृभाषा परिवार के नवोदित रचनाकारों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?*
डॉ काज़ी: मातृभाषा, नवोदित शब्दकारों की शाब्दिक अभिव्यक्ति के लिए प्रतिबद्ध है ।
उन्हें प्रतिस्पर्धा के इस युग में इससे बेहतर डिजिटल मंच नहीं मिल सकता । आपके लेखन को उड़ान देने के लिए मातृभाषा अग्रणी है।
*पाठकों के लिए कुछ खास ,जो आप कहना चाहें?*
डॉ काज़ी: बस इतना सपने देखते हो तो अथक परिश्रम और उचित मार्गदर्शन से उन्हें हक़ीक़त में बदलना भी सीखो ।
अंत में इतना ही कहूंगा अपनी पंक्तियों के ज़रिए –
न मीनार बनने की हसरत
न गुम्बद बनकर इठलाया हूं ।
मैं हूं नींव का पत्थर,
अंधेरों में रहकर भी जगमगाया हूं।।
  मतलब निस्वार्थ कर्म साधना में लगे रहे।

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