
है चपल नदी की धार,
सतत बहती कल-कल।
स्थिर रहे तो होती वह
पावन और निर्मल।
और तड़ित भी गगन में
विहरे चंचल-चपल बन।
जब व्योम में छाते हैं काले
वारिद सघन घन।
अग्नि भी है धधकती,
धरा पर चंचला सी
ना कोई समझे इन्हें,
यहां महज अबला सी।
नदी वेग में होती है तो,
धरती रुदन ठानती है।
और तड़ित शक्ति को भी।
यह दुनिया जानती है।
अग्नि जले सहज तो,
जग में होती होली।
किन्तु रौद्र रूप ये धर ले तो,
लगती यम की बोली।
सुनो नारी को चपला,
चंचला कहने वाले।
अग्नि, तड़ित, नदी की शक्ति,
का पहले पार तो पालें।
नारी निज स्वभाव से,
शांत-सौम्य होती है।
दुःख के वशीभूत हो यह,
कभी- कभी रोती है।
किन्तु जब भी बात,
आन की आ जाये।
संभव नहीं देव-दनुज भी,
पार इससे पा जाये।
यही चपला तब,
इतनी स्थिर हो जाती है।
कि प्राण पति के यह,
यम से भी खींच लाती है
#अमिताभ प्रियदर्शी
परिचय:अमिताभ प्रियदर्शी की जन्मतिथि-५ दिसम्बर १९६९ तथा जन्म स्थान-खलारी(रांची) है। वर्तमान में आपका निवास रांची (झारखंड) में कांके रोड पर है। शिक्षा-एमए (भूगोल) और पत्रकारिता में स्नातक है, जबकि कार्यक्षेत्र-पत्रकारिता है। आपने कई राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक अखबारों में कार्य किया है। दो अखबार में सम्पादक भी रहे हैं। एक मासिक पत्रिका के प्रकाशन से जुड़े हुए हैं,तो आकाशवाणी रांची से समाचार वाचन एवं उद्घोषक के रुप में भी जुड़ाव है। लेखन में आपकी विधा कविता ही है।
सम्मान के रुप में गंगाप्रसाद कौशल पुरस्कार और कादमबिनी क्लब से पुरस्कृत हैं। ब्लाॅग पर लिखते हैं तो,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा रेडियो से भी रचनाएं प्रकाशित हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-समाज को कुछ देना है
Sat Mar 9 , 2019
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