“मम्मा! नाना जी का कॉल आया था,” वॉकिंग से लौटी गीता से घर में घुसते ही तनुज ने कहा।
“क्या कह रहे थे नानाजी?”
“मेरे फोन उठाने तक तो कट गया, मुझे पासवर्ड नहीं पता तो कॉल बैक भी नहीं कर पाया,” फोन में पासवर्ड डालने की भड़ास को ज़ाहिर करते हुए तनुज ने उत्तर दिया।
“हैलो पापा! कैसे हैं? आपने कॉल किया था ?
” सब ठीक है, आज और कल तेरा फोन नहीं आया तो याद आ रही थी तेरी, इसलिए फोन किया” पापा ने लाड जताते हुए कहा।
” अरे!पापा फाइनल एग्जाम के चक्कर में स्कूल में व्यस्त थी थोड़ा, इसलिए कॉल नहीं कर पाई, सब ठीक हैं ना घर में?”
“सब ठीक हैं यहाँ , तनुज और दामाद जी मजे में होंगे ? तेरे ससुराल के क्या हाल चाल, सब ठीक होंगे वहाँ? फोन-फान तो करती होगी तू सास ससुर को…?
“ठीक ही होंगे, ये करते हैं फोन वहाँ, मैं नहीं करती फोन उनको..।”
“वृद्ध लोग हैं वो, दूसरे तीसरे दिन हाल चाल पूछ लिया कर , अच्छा लगेगा उनको भी और तुझे भी”।
” अच्छा नहीं बुरा ही लगेगा उनको फोन करके, उनको फोन करके अपनी इंसल्ट थोड़े ना करवानी है मैंने, ना बाबा ना। हमेशा उल्टा-उल्टा बोलते हैं वे लोग हमेशा”।
“उल्टा उल्टा मतलब?”
“मतलब आप जानते हो पापा…।”
“कोई बात नहीं बेटा, उनकी उल्टी बातों का तू सीधा मतलब निकाल लिया कर…।बुजुर्गो की बातें, बातें नहीं बल्कि अनुभव और ज़िन्दगी की सीख है जो कुछ न कुछ सिखाते ही हैं। घर के बुजुर्ग वो पके पात और वो टहनियाँ हैं जो गिरने से पहले आस पास की कोमल पत्तियों को अपनी चर्र- चर्र आवाज से हवा की गति और रुख बतलाते हैं, ताकि नई पौंध गर्म सर्द मौसम को झेल सके…।