विदेशी भाषा में पढ़कर हमारे बच्चे मौलिकता खो देते हैं

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कोलकाता |

‘अपनी भाषा’ संस्था ने अपना अठारहवाँ स्थापना दिवस समारोह मनाते हुए भारतीय भाषा परिषद सभागार में ‘बौद्धिक समाज और भाषिक उदासीनता’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया. विशिष्ट अतिथि डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कहा कि ‘अपनी भाषा’ वह मशाल जला रही है जो भारतीय भाषाओं को अंधेरे के गर्भ में जाने से बचा सकती है. स्वभाषा में हस्ताक्षर करना गुलाम मानसिकता से उबरना है, साथ ही अपनी भाषाओं और अपने देश को मौजूद करना है. आज देश में कोई ऐसा चरित्र नहीं है जिसका अनुकरण किया जा सके. देश अममून नेतृत्वविहीन हो चुका है. ऐसे ही स्थिति में फ्रांस, रुस और जांन पिट्सबर्ग में खूनी क्रांति ने जन्म लिया. लेकिन हमने इसे भी विफल होते देखा है. विचारों की ताकत परमाणु बम से भी अधिक है. अंग्रेजी हटाओ का मतलब यह थोड़े ही है कि अंग्रेजी मिटाओ. अंग्रेजी हमारी बौद्धिक क्षमता को खत्म कर रहा है. हम शनै: शनै: चारित्रिक छिन्नता के शिकार हो रहे हैं. सरकारी नौकरियों में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त होनी चाहिए और संसद में नेतागण स्वभाषा में ही भाषण दें. अंग्रेजी के कारण हमारी न्याय व्यवस्था अन्याय व्यवस्था में बदल गयी है.

संगोष्ठी के अध्यक्ष प्रो. रविभूषण ने कहा कि भाषा के प्रति बौद्धिक समाज अपना नैतिक दायित्व नहीं निभा रहा है. भाषा के नष्ट होने का अर्थ है, अपने समाज, संस्कृति और भावों से कट जाना है. भाषा केवल कविता में नहीं बचती, वह तब बचती है, जब वह जीवन में भी बची रहती है. संगोष्ठी के मुख्य वक्ता पंजाब विश्वविद्यालय के प्रो. जोगा सिंह विर्क ने कहा कि अंग्रेजी भाषा में पढ़ने वालों के बच्चों की भाषा एक दिन अंग्रेजी होगी और तब हमारी स्व-भाषाएं संस्कृत की तरह मृतप्राय हो जाएगी. जब तक हमारी स्व-भाषाएँ शिक्षा का माध्यम नहीं बनेंगी, तब तक वह नहीं बचेगी. आज हमारा देश विज्ञान, टेक्नोलॉजी, डॉक्टरी, इंजीनियरिंग आदि में पिछड़ा हुआ है तो केवल अंग्रेजी के माध्यम होने के कारण. जापान 1945 के 15 वर्षों में ही फिर से महाशक्ति बनकर उभरा तो केवल इसलिए कि उसने मातृभाषा को ही शिक्षा का माध्यम बनाए रहा. भारत से 2 साल बाद आजाद हुए चीन ने आज विश्व में एक सर्वशक्तिशाली महाशक्ति के रुप में उभरा तो इसी कारण. दुनिया का कोई भी विकसित देश विदेशी भाषा में शिक्षा नहीं देता. जो देश शिक्षा में आगे होगा, वही दुनिया पर राज करेगा और जो देश अपनी स्व-भाषाओं में शिक्षा देगा वही शिक्षा में आगे होगा. अपनी भाषा के अध्यक्ष प्रो. अमरनाथ ने कहा कि भाषा के मुद्दे पर बौद्धिक समाज की गहरी चुप्पी शुभ संकेत नहीं है. धारा के विरुद्ध चलने का काम कठिन है. यह सरकार का दायित्व है कि अंग्रेजी का वर्चस्व कैसे कम हो? यह काम करे सरकारें. सरकार के ठीक से काम न करने के कारण आज 90℅ आभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाते है.

वक्ता और चिंतक डॉ. प्रियंकर पालीवाल रवींद्रनाथ के हवाले से कहा कि ‘अंग्रेजी हमारे भाव की भाषा नहीं है’ और जो हमारे जीवन और भाव की भाषा नहीं है, उसे शिक्षा का माध्यम बनाए रखकर एक ऐतिहासिक गलती करते आ रहे हैं. इस अवसर पर अपनी भाषा की लगभग 20 वर्षों की लोक-यात्रा का साहित्यिक इतिहास का पुस्तकाकार रुप में लोकार्पित हुआ. कार्यक्रम में डा. हितेंद्र पटेल, संस्था के महासचिव प्रो. अरुण होता, डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी, डॉ. वासुमति डागा, जीवन सिंह, डॉ. राजेंद्र, डॉ. रचना पांडेय, डॉ. अर्चना द्विवेदी, डॉ. रीना राय, ज्योति चौधरी आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. बीरेन्द्र सिंह और धन्यवाद ज्ञापन की औपचारिक भूमिका डॉ. विक्रम कुमार साव ने किया.

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।