
कि जीवन जीने का है काम
कि जीवन मरने का है लक्ष्य
कि जीवन कटता है हर याम
कि जीवन बनता है बस भक्ष्य
लगी है युद्धों की जो आग
छेड़ता कौन है इसका राग
दूर से देख जगत का नाश
गाता कौन मौज का फाग
जानता है जब नर सब सत्य
खोज चुका है सारा ज्ञान
कहां फिर भ्रमित पड़ा जग है
आज भी रचता युद्ध विधान
मिटाता नर अपनी हर प्यास
बना भौतिकता को आधार
पर रह जाती है कुछ शेष
उठाये कौन वहन का भार
बनी जो प्रकृति हाथ से सीमा
उल्लघंन नर ने किया सकल
प्यास की रही नही मर्यादा
आज व्याकुलता स्वयं विकल
#अनूप सिंह
परिचय : अनूप सिंह की जन्मतिथि-१८ अगस्त १९९५ हैl आप वर्तमान में दिल्ली स्थित मिहिरावली में बसे हुए हैंl कला विषय लेकर स्नातक में तृतीय वर्ष में अध्ययनरत श्री सिंह को लिखने का काफी शौक हैl आपकी दृष्टि में लेखन का उद्देश्य-राष्ट्रीय चेतना बढ़ाना हैl
Wed Sep 12 , 2018
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