उन्मुक्त मन

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pritee

मन भटकता है,तो भटकने दो,
उन्मुक्त गगन में,पंछी-सा विचरने दो।

न लगाओ पहरे,इस सिरफिरे दीवाने पर,
जो चाहे,जैसा चाहे उसे करने दो।

मस्त मौला है ये,कब किसी की सुनता है,
हर वक्त हर लम्हा मौज में ही जीता है।

फूलों-फूलों,डाली-डाली इसे भँवरे-सा भ्रमरने दो,
जो चाहे,जैसा चाहे उसे करने दो।

सूरज की रक्तिम किरणों-सा,सर्वत्र इसे बिखरने दो,
चन्द्रमा की चांदनी-सा,शीतल मन्दाकिनी-सा अम्बर में चमकने दो।

न रोको,इस परवाने को,चंचल चपल चितचोर को चहुँओर तुम चहकने दो,
जो चाहे,जैसा चाहे उसे करने दो।

                                                                              #प्रीती दुबे

परिचय : मध्य प्रदेश में ही निवासरत प्रीति दुबे प्रधानमंत्री सड़क योजना छिंदवाड़ा में उपयंत्री के पद पर कार्यरत हैं।आपने कुछ समय पहले ही शौकिया तौर पर लिखना शुरू किया है। आपकी रचनाओं का खास तत्व स्त्री और प्रेम है।

matruadmin

4 thoughts on “उन्मुक्त मन

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