धधकने लगी हैं चमन ये फिजायें,
कि ऐसे में हम मुस्कुराएँ तो कैसे!
वतन जल रहा है पतन की अगन में,
अगन ये पतन की बुझाएं तो कैसे!
है अभिशाप जैसी हुई राजनीति,
इस अभिशाप से मुक्ति पाएं तो कैसे!
नही अब धरा पर भागीरथ भी कोई,
धरा धार गंगा की लाएं तो कैसे!!
बड़ी ही तपिश है धरा पर पवन में
तपिश ये पवन की मिटाएँ तो कैसे
धधकने लगी ये चमन ये फिजायें
कि ऐसे हम मुस्कुराएँ तो कैसे……….!!
ये जाति धरम का जहर घोल करके,
ये नेता बड़े चैन से जी रहे हैं!
बनी है सदा मूर्ख जनता हमारी
ले शिव रूप सारा जहर पी रही है!
हुआ ना भला फूंक कर घर किसी का ,
ये बदले की ज्वाला बुझाएं तो कैसे!!
धधकने लगी ये चमन ये फिजायें
कि ऐसे में हम मुस्कुराएँ तो कैसे………!!
बने गर जो दुश्मन ये दुनियां हमारी ,
तो दुनिया से लड़ने की कर लें तैयारी!!
ये अपने हैं अपनो से कैसी लड़ाई
यही बात सबको बताएं तो कैसे!!
धधकने लगी ये चमन ये फिजायें
कि ऐसे में हम मुस्कुराएँ तो कैसे………!!
जो दिन रात सीमा पे देते हैं पहरे नमन एक उनको हृदय कर रहा है
जो बाँधे कफ़न मर मिटे हैं वतन पे
है हरदम तिरंगे की लाज बचाई
हृदय कर रहा है करुण गान अब तो
न उनकी शहादत भी कुछ काम आई
धधकनेलगी ये चमन ये फिजायें
कि ऐसे में हम मुस्कुराएँ तो कैसे…….
ये बिन बात की जो लड़ाई मची थी,
जिसमें माँओ ने लाखों ललन खो दिया है
द्रवित कण्ठ है और नम हैं ये आँखे,
नमन है वतन पर मिटे हर ललन को ,
शहादत ह्र्दय से मिटाएं तो कैसे!!
धधकने लगी ये चमन ये फिजायें
कि ऐसे में हम मुस्कुराएँ तो कैसे !!
वतन जल रहा है पतन की अगन में,
अगन ये पतन की बुझाएं तो कैसे!!
#गरिमा सिंह
परिचय-
नाम- गरिमा अनिरुद्ध सिंह
साहित्यिक उपनाम-मधुरिमा
राज्य-गुजरात
शहर-सूरत
शिक्षा- एम ए प्राचीन इतिहास
कार्यक्षेत्र-शिक्षण
विधा – हास्य ,वीर रस ,शृंगार