धन्य तुम्हारा हे जन

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धन्य तुम्हारा भारतवासी ,माटी सदा ऋणी रहेगी,
संघर्ष समय में सहयोग तुम्हारा सदा गुढी रहेगी,

घर में रह कर तुमने,निज कर्तव्यों का मान रखा,
धन्य तुम्हारा हे जन,जो जन-गण-मन का मान रखा,

माना सूरज डूब रहा,अँधियारा हमपे हावी है,
लेकिन हिम्मत हो तो, एक चींटी हांथी पे भारी है,

विकसित देश हुए पीछे,हमने अपना पहचान रखा है,
धन्य तुम्हारा हे जन,जो जन-गण-मन का मान रखा है,

करतल ध्वनि में कंपन, शंकर के डमरू वाली थी,
और विषाणु में भी बल सर्वस्व मिटाने वाली थी,

सरल नही था!लड़कर हमने अपना मान रखा है,
धन्य तुम्हारा हे जन,जो जन-गण-मन का मान रखा,

कुछ ईस्वर हैं जिनका ऋणी समूचा देश रहेगा,
वो पुलिस,सिपाही,या फिर कोई उपचारक का भेष रहेगा,

नमन हमारा उनको जिनने सबका ध्यान रखा,
धन्य तुम्हारा हे जन,जो जन-गण-मन का मान रखा,

# ️दिप्तेश तिवारी

परिचयनाम:-दिप्तेश तिवारीपिता :-श्री मिथिला प्रसाद तिवारी(पुलिस ऑफिसर)माता:-श्रीमती कमला तिवारी (गृहणी)शिक्षा दीक्षा:-अध्यनरत्न 12बी ,स्कूल:-मॉडल हायर सेकेंडरी स्कूल रीवा परमानेंट निवास:-सतना (म.प्र)जन्म स्थल:-अरगट प्रकाशित रचनाए:-देश बनाएं,मैं पायल घुँगुरु की रस तान,हैवानियत,यारी,सहमी सी बिटिया,दोस्त,भारत की पहचान आदि।

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।