सीखता तो मैं आज भी हूँ ….आप से…

ps dhanwal
सीखने की प्रक्रिया यूँ तो मस्तिष्क की होती है लेकिन जुड़ी हुई मन से है। हम कोई दृश्य को कैसे देखते है ये हमारी मनःस्थिति पर निर्भर है। मन उस वक्त कौन सी दशा में है उस पर समझने की दिशा तय होती है। आसपास की परिस्थितियों का और अपनी खुद की भावनाओं का भी बहुत असर पड़ती है मन पर। मन जब सकुचाया सा, दबा हुआ या बोझिल होता है उस वक्त जो भी हम देख रहे है जो भी हम सुन रहे है या जो भी हम सोच रहे है उन सब का कोई तालमेल नही होता। तब आँखें सिर्फ़ देखती है।कान सिर्फ़ सुनते है। अपने मस्तिष्क में इस की कोई छाप नही बनती।
कभी-कभी बहुत प्रयासों के बाद भी हमें लगता है कि ये हम से नहीं होगा और हम प्रयास छोड़ देते है। मगर उस वक्त भी सीखने की प्रक्रिया तो हमारें आंतरिक मन में चलती ही रहती है और जब उसका प्रस्फुटन होता है तब हमें लगता है कि अरे..! ये तो मैनें सीखते सीखते छोड़ दिया था आज अचानक कैसे आ गया..!
सीखने की प्रक्रिया हरेक की भिन्न होती है। क्यूँकि हरेक की अपनी गति होती है। अपनी मति होती है। कोई औरों से सीखता है तो कोई खुद के अनुभवों से सीखता है। बचपन से लेकर मृत्यु  तक ये प्रक्रिया जारी रहती है और रहनी भी तो चाहिए..! मानव जीवनभर सीखता रहता है तभी तो वो जिंदा है। जब भी रुक गया मानो मर गया कोई बंधियार जल की तरह। जो बहता है वही रहता है।

           मैं भी तो सिख रहा हूँ आप सब से। बस धैर्यपूर्वक सिखाते रहिए। दोस्तों की जिम्मेदारी प्यार से सिखानी होती है। ठोकरों से तो मैं आज तक बहुत सीखा हूँ और दुश्मनों ने भी सिखाया है। कदम कदम सावधानी बरतना। सीखने को तो मैं तैयार हूँ एकदम बच्चा जैसा बस सिखाने वाला चाहिए। वो चाहे आप हो आप का प्यार और आपका धैर्य हो या फिर…।

पी एस धनवाल,
 बालाघाट(मप्र)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।