सीखता तो मैं आज भी हूँ ….आप से…

0 0
Read Time2 Minute, 31 Second

ps dhanwal
सीखने की प्रक्रिया यूँ तो मस्तिष्क की होती है लेकिन जुड़ी हुई मन से है। हम कोई दृश्य को कैसे देखते है ये हमारी मनःस्थिति पर निर्भर है। मन उस वक्त कौन सी दशा में है उस पर समझने की दिशा तय होती है। आसपास की परिस्थितियों का और अपनी खुद की भावनाओं का भी बहुत असर पड़ती है मन पर। मन जब सकुचाया सा, दबा हुआ या बोझिल होता है उस वक्त जो भी हम देख रहे है जो भी हम सुन रहे है या जो भी हम सोच रहे है उन सब का कोई तालमेल नही होता। तब आँखें सिर्फ़ देखती है।कान सिर्फ़ सुनते है। अपने मस्तिष्क में इस की कोई छाप नही बनती।
कभी-कभी बहुत प्रयासों के बाद भी हमें लगता है कि ये हम से नहीं होगा और हम प्रयास छोड़ देते है। मगर उस वक्त भी सीखने की प्रक्रिया तो हमारें आंतरिक मन में चलती ही रहती है और जब उसका प्रस्फुटन होता है तब हमें लगता है कि अरे..! ये तो मैनें सीखते सीखते छोड़ दिया था आज अचानक कैसे आ गया..!
सीखने की प्रक्रिया हरेक की भिन्न होती है। क्यूँकि हरेक की अपनी गति होती है। अपनी मति होती है। कोई औरों से सीखता है तो कोई खुद के अनुभवों से सीखता है। बचपन से लेकर मृत्यु  तक ये प्रक्रिया जारी रहती है और रहनी भी तो चाहिए..! मानव जीवनभर सीखता रहता है तभी तो वो जिंदा है। जब भी रुक गया मानो मर गया कोई बंधियार जल की तरह। जो बहता है वही रहता है।

           मैं भी तो सिख रहा हूँ आप सब से। बस धैर्यपूर्वक सिखाते रहिए। दोस्तों की जिम्मेदारी प्यार से सिखानी होती है। ठोकरों से तो मैं आज तक बहुत सीखा हूँ और दुश्मनों ने भी सिखाया है। कदम कदम सावधानी बरतना। सीखने को तो मैं तैयार हूँ एकदम बच्चा जैसा बस सिखाने वाला चाहिए। वो चाहे आप हो आप का प्यार और आपका धैर्य हो या फिर…।

पी एस धनवाल,
 बालाघाट(मप्र)

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

बुंदेली ग़ज़ल

Tue Jul 31 , 2018
मंच लूट लै गये जुगाड़ू अब का कल्लँय, हम रय जेमै सदा पिछाड़ू अब का कल्लँय! ००० साफ़-स्वच्छ जग्घा पे अकड़ू आन विराजे, हमरे हिस्से में बस झाड़ू अब का कल्लँय! ००० इतै-उतै की धरैं समैटैं हैं जो कविता, बने मंच के बेई साड़ू अब का कल्लँय। ००० डटे भीड़ […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

आपका जन्म 29 अप्रैल 1989 को सेंधवा, मध्यप्रदेश में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर हुआ। आपका पैतृक घर धार जिले की कुक्षी तहसील में है। आप कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। आपने अब तक 8 से अधिक पुस्तकों का लेखन किया है, जिसमें से 2 पुस्तकें पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध हैं। मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मातृभाषा डॉट कॉम, साहित्यग्राम पत्रिका के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 21 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण उन्हें वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं और ख़बर हलचल न्यूज़ के संस्थापक व प्रधान संपादक हैं। हॉल ही में साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन संस्कृति परिषद्, संस्कृति विभाग द्वारा डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' को वर्ष 2020 के लिए फ़ेसबुक/ब्लॉग/नेट (पेज) हेतु अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से अलंकृत किया गया है।