कण कण में राधारमण,जमनाजल का पान। चेतन वल्लभ साधना,गाया है रसखान।। जयजय भूमी जय ब्रज मंडल। जमना पूजन नीर कमंडल।।1 चौरासी परिकम्मा करते । जीवन धन्या श्याम सुमरते।।2 पैदल चलते कर फलहारी।। बिनु पादुक से महिमा भारी।।3 सादा खाते नीचे सोते। संतो जैसा जीवन जीते।।4 पल पल बोलें राधे राधे। […]
काव्यभाषा
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घनघोर घटा लिपटी ज्यों जटा अवधूत शोभे, भवभूत हिमालय पांव पखारे , भावार्थ- सेवार्थ भारत मां का सपूत हिमालय रिपु से रक्षा करे महारक्षक जुग-जुग जिए अग्रदूत हिमालय महर्षि मनस्वी, यशस्वी तपस्वी अवधूतों का है अवधूत हिमालय जड़ों में जड़ी जड़ीबूटी जोड़ी-जोड़ी रिद्धि-सिद्धि,समृद्धि अकूत हिमालय दिव्य देवपगा गिरि जनक कनक […]
