mohsin
कुछ लोगों का मानना है कि गांधी की हत्या गोडसे ने की,लेकिन यह जायज हत्या नहीं है। वो भी गांधी जैसे व्यक्तित्व की हत्या ? ? ? मेरा प्रश्न है कि गांधी के संदर्भ में हत्या भी क्या कभी जायज हुआ करती है ? ? ? गांधी जी की हत्या को जायज और नाजायज कैसे ठहराया जा सकता है ? हत्या तो हत्या ही है। हिंसा,नफरत और असहिष्णुता ही व्यक्ति को हत्या की तरफ ले जाती है। अब आप ही बताएं गांधी जी की हत्या जायज और नाजायज कैसे हो सकती है ? ? ?
कई विरोधी और मतांध बुद्धि के लोगों का यह मानना है कि गांधी ने कोई विशेष बात नहीं की और न ही कोई विशेष प्रकार के सिद्धांत दिए हैं। गांधी ने सच है कि,कोई विशेष बात नहीं की,यह उनकी दृष्टि में है,लेकिन गांधी खुद अपने विषय में कहते हैं कि ‘मैं कोई विशेष और नई बात नहीं कह रहा हूं जो शास्त्रों में लिखा है जो मानवीय मूल्य और समाज के लिए आवश्यक बातें हैं,उन्हीं को मैं दोहरा रहा हूं। मैं कोई नई सिद्धांतों की रचना नहीं कर रहा हूं गांधी खुद कहते हैं मैं विशेष कुछ नहीं कह रहा।’
गांधी के विषय में एक बहुत मजाकिया किस्म की धारणा भी समाज में प्रचलित हो गई है। कुछ कहते हैं कि गांधी बहुत पहुंची हुई चीज थे। पहुंची हुई चीज थे इससे क्या आशय लगाया जाए यह वास्तव में एक इस प्रकार का जुमला है जिसके माध्यम से गांधी के व्यक्तित्व को बिगाड़ने का प्रयास किया जाता है या शंका की दृष्टि से देखना उन्हें नजर में आता है। गांधी पहुंची हुई चीज न थे, बल्कि साधारण होने की प्रक्रिया में थे।
किसी किसी का मानना है कि,गांधी ने जनता को मोड़ दिया और अपने पक्ष में कर लिया। मैं कहता हूं उन्होंने गांधी को ना तो पढ़ा है और ना गांधी को समझा।वह यह मानकर चलते हैं कि गांधी ने आधी जनता को अपनी तरफ करने के लिए विशेष प्रकार के भाषणों का प्रयोग किया,विशेष प्रकार की नाजुक स्थितियों को मुद्दा बनाने का प्रयास किया। मैं कहता हूं कि उन्होंने इस प्रकार का कोई प्रयास नहीं किया,बल्कि लोगों को उन्होंने जागृति प्रदान की और राष्ट्र की वास्तविक स्थिति से परिचय कराया और एकजुट होकर सभी को राष्ट्रीय आंदोलनों में  जनभागीदारी  के तहत संघर्ष करना सिखाया। गांधी ने जनता को मोड़ा नहीं, बल्कि जगाया है।
एक और प्रश्न भी लोग करते हैं कि गांधी की हत्या एक हिंसा का काम है,लेकिन मैं यह कहता हूं जो हत्यारे हैं वह तो हिंसक है ही और राष्ट्रद्रोह के प्रतीक भी हैं, लेकिन गांधी ने कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं किया,इसलिए गांधी का दूसरा पर्याय अहिंसा है,गांधी अहिंसा का नाम है।
कुछ लोग गांधी को भगवान का दर्जा देने लगते हैं या उनको महिमामंडन करने के लिए भगवान,मिथक और पुराणों की भी बात करते हैं कि वह इस प्रकार से एक युग के नायक अवतार हैं,जैसे कभी कृष्ण  अर्जुन या राम ही रहे होंगे। मैं कहता हूं गांधी पिछली सदी का एक मानवीय गौरव है जिसने मानवता को गौरव प्रदान किया और उच्चता की ओर मानवता को ले गए। वह भगवान नहीं,  बल्कि आम जनता के बीच से एक ऐसा जननायक है,जिसने आम जनता को  उसकी महिमा को मान्यता के साथ जोड़ा है, इसलिए गांधी को भगवान की महिमा से न जोड़ें।
गांधी के विषय में भी एक धारणा प्रचलित हो गई है कि,उनके सारे आश्रम उनकी संपत्ति है। वह अबोध और अज्ञानी हैं। यदि वह संपत्ति बनाते तो अपना आधा भाग नंगा नहीं रखते। गांधी भौतिक संपत्ति के हकदार नहीं,बल्कि उनकी संपत्ति तो सारा भारत और भारत के संपूर्ण वासी ही हैं। गांधी के नाम पर कोई संपत्ति नहीं,वो मालिक नहीं सेवक थे।
एक और प्रश्न भी किया करते हैं कि,  गांधी ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया,लेकिन अपनी वाणी को पहुंचाने के लिए माइक और रेडियो का सहारा लिया। उन्होंने क्यों नहीं इसका विरोध किया ? मैं कहता हूं कि,गांधी संचार साधनों का उपयोग करते हैं इसलिए वह वैज्ञानिक पद्धति को महत्व देते हैं। वह व्यवसायिक नहीं थे। यदि व्यवसायिक होते तो उन पर आक्षेप लगाना लाजमी होते। संचार और व्यवसाय में फर्क है।
इतिहास की अबोधता के कारण लोग गांधी को दोषी ठहराते हैं कि,गांधी ने ही पाकिस्तान की नींव रखी। जिन्ना को भूल जाते हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण का दोष और ठीकरा भी गांधी के सिर पर फोड़कर खुश होते हैं। वह लोग इतिहास उठाकर देखें कि गांधी की मंशा क्या थी। दोष देना और ज़िम्मेदार ठहराना बड़ा आसान है,लेकिन गांधी के स्तर पर खड़े होकर सोचना कठिन है जो प्रायः लोग कर नहीं पाते हैं। गांधी ने पाकिस्तान बनाने का विरोध किया था।
गांधी के बारे में एक हास्यास्पद यह बात भी जोड़ दी जाती है कि,हम सबका बाप गांधी है। मैं कहता हूं हम सबका बाप नहीं,बल्कि राष्ट्रपिता गांधी हैं। गांधी बाप नहीं,बापू हैं।
कुछ विरोधी और भटके हुए लोगों का यह मानना है कि,गांधी की हत्या करके गोडसे ने गांधी को अमर बना दिया। मुझे बहुत हँसी आती है कि कोई किसी की हत्या करके किसी को अमर कैसे बना सकता है ? ? ? व्यक्ति के अपने कर्म,  सिद्धांत,मानवी मूल्य,सौहार्द,सहिष्णुता, उदारता,विश्व व्यापक दृष्टि ही उसे महान बनाती है और अमर बनाती है। गोडसे ने गांधी को अमर नहीं किया,गांधी हत्या से अमर नहीं हुए,विचारों और राष्ट्रीय संघर्ष से अमर हैं।

           #डॉ. मोहसिन ख़ान

परिचय : डॉ. मोहसिन ख़ान (लेफ़्टिनेंट) नवाब भरुच(गुजरात)के निवासी हैं। आप १९७५ में जन्मे और मध्यप्रदेश(वर्तमान में महाराष्ट्र)के रतलाम से हैं। आपकी शैक्षणिक योग्यता शोधोपाधि(प्रगतिवादी समीक्षक और डॉ. रामविलास शर्मा) सहित एमफिल(दिनकर का कुरुक्षेत्र और मानवतावाद),एमए(हिन्दी)और बीए है। ‘नेट’ और ‘स्लेट’ जैसी प्रतियोगी परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने के साथ ही अध्यापन(अलीबाग,जिला-रायगढ़ में हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निदेशक और अन्य महाविद्यालयों में भी)का भी अनुभव है। 50 से अधिक शोध-पत्र व आलेख राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। साथ ही ‘देवनागरी विमर्श (उज्जैन),
उपन्यास-‘त्रितय’,ग़ज़ल संग्रह- ‘सैलाब’और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ और गज़लें भी प्रकाशित हैं। बतौर रचनाकार आप हिन्दी साहित्य सम्मेलन(इलाहाबाद), राजभाषा संघर्ष समिति(नई दिल्ली), भारतीय हिन्दी परिषद(इलाहाबाद) एवं (उ.प्र. मालव नागरी लिपि अनुसंधान केन्द्र(उज्जैन,म.प्र.)आदि से भी जुड़े हुए हैं। कई साहित्यिक कार्यक्रम सफलता से सम्पन्न करा चुके हैं,जिसमें नाट्य रूपान्तरण एवं मंचन के रुप में प्रेमचंद की तीन कहानियों का निर्देशन विशेष है। अन्य गतिविधियों में एनसीसी अधिकारी-पद लेफ्टिनेंट,आल इंडिया परेड कमांड में सम्मानित होना है। इसी सक्रियता के चलते सेना द्वारा प्रशस्तियाँ एवं सम्मान के अलावा कुलाबा गौरव सम्मान,बाबा साहेब आम्बेडकर फैलोशिप दलित साहित्य अकादमी (दिल्ली)से भी सम्मान पाया है। समाजसेवा में अग्रणी डॉ.खान की संप्रति फिलहाल हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निदेशक तथा एनसीसी अधिकारी (अलीबाग)की है।

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