हे सावन तुम अब मत आना

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umesh
हे ! सावन
तुम अब मत आना
तुम्हारे नाम से ही हृदय मयूर
नृत्य करने लगता है,
तरह-तरह की भावनाएं
हिलोरें लेने लगती हैं
चहुँ ओर हरा-भरा हो जाता है।

पर,
कुछ के लिए
तुम काल बन जाते हो,
तुम्हारी वृष्टि का वेग
बर्बादी के मंज़र को आमंत्रण दे देता है,
सब कुछ बहा ले जाता है।

कितने ही लोग
बेघर,अनाथ,असहाय
और
मृत हो जाते हैं कुछ ही क्षण में,
लोगों की चीत्कार
किसी शून्य में समाहित हो जाती है।

पर तुम बेदर्द जो ठहरे,
इस पावन मास में तुम नरभक्षी कब से हो गए?
ये विनाश अब नहीं देखा जाता मुझसे
इसलिए,
हे ! सावन
तुम अब मत आना…॥

                                                                    #उमेश कुमार गुप्त

परिचय : उमेश कुमार गुप्त का १९८९ में जन्म हुआ है और निवास भाटपार रानी देवरिया(उत्तर प्रदेश) है। जिला देवरिया में रहने वाले उमेश गुप्त के प्रकाशित साहित्य में साझा काव्य संग्रह(जीवन्त हस्ताक्षर,काव्य अमृत, कवियों की मधुशाला) है तो प्रकाशाधीन साहित्य भी है। भारत के श्रेष्ठ युवा कवि-कवियित्रियाॅ में आपकी रचना है तो साझा कहानी संग्रह(मधुबन) भी आपने लिखा है।अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन जारी है। आपकी लेखनी की बदौलत कई शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं। काव्य अमृत सम्मान 2016 आपको मिला है ।

matruadmin

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