Read Time2 Minute, 16 Second
जिन्दगी का झरोखा,
जीवन में प्रकाश की
किरणें दिखाता है।
कभी उजाला कभी,
अंधेरा होता है।
सुख-दुख भी,
उजाले-अंधेरों की
तरह आते-जाते हैं।
जीवन के संग्राम,
को पार लगाते हैं।
इन्सान जीवन की,
मोह-माया में
भटकता रहता है।
अपने-पराए में,
हमेशा लगा रहता है।
तेरा-मेरा के भेद का,
भाव करता रहता है।
अपने-पराए में एक,
दूसरे में बंटा रहता है।
जिन्दगी का झरोखा
कभी खुलता है,
कभी बन्द होता है।
कभी सुख का प्रकाश
धीरे से आता है,
खुशियाँ लुटा जाता है
कभी दुख की किरणें,
जिन्दगी के झरोखे
से प्रवेश करती है।
दुखी इन्सान रोता है,
जीवन के मोह-माया
के वीच सभी भटकते हैं,
ऐसे ही जीवन जीते हैं।
#अनन्तराम चौबे
परिचय : अनन्तराम चौबे मध्यप्रदेश के जबलपुर में रहते हैं। इस कविता को इन्होंने अपनी माँ के दुनिया से जाने के दो दिन पहले लिखा था।लेखन के क्षेत्र में आपका नाम सक्रिय और पहचान का मोहताज नहीं है। इनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं।साथ ही मंचों से भी कविताएँ पढ़ते हैं।श्री चौबे का साहित्य सफरनामा देखें तो,1952 में जन्मे हैं।बड़ी देवरी कला(सागर, म. प्र.) से रेलवे सुरक्षा बल (जबलपुर) और यहाँ से फरवरी 2012 मे आपने लेखन क्षेत्र में प्रवेश किया है।लेखन में अब तक हास्य व्यंग्य, कविता, कहानी, उपन्यास के साथ ही बुन्देली कविता-गीत भी लिखे हैं। दैनिक अखबारों-पत्रिकाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। काव्य संग्रह ‘मौसम के रंग’ प्रकाशित हो चुका है तो,दो काव्य संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित होंगे। जबलपुर विश्वविद्यालय ने भीआपको सम्मानित किया है।
Post Views:
86
Mon Jan 22 , 2018
गिट्टी ऊपर गिट्टी की होड़, मिलकर खेलें गिट्टी फोड़। लगा निशाना तान के गेंद, छितरे गिट्टी होड़ को तोड़। लपके सारे गेंद की ओर, बंटी,हरिया,मधु,किशोर। धर पाया ना भूरा होड़, […]