नववर्ष तेरा मुझसे क्या नाता

Read Time2Seconds
vijaylakshmi
कैसे मनाऊं खुशियां,
नववर्ष! तेरा मुझसे क्या नाता ?
बिलखते भूखे बच्चे रोते,
सर्द ठिठुरती माता…
सड़कों पर किलकारी सोती
लिए सपनों में सन्नाटा,
अपमानित होती हर बाला
मन जब नोंचा जाता।
जर्जर काया मां की बोली
पूत क्यों न घर लाता,
उदास खड़ा पिता दरवाजे
मन को रहा मनाता।
संस्कार हुए क्यों बेगाने
क्यों भाषा से न नाता…।
कैसे मनाऊं खुशियां,
नववर्ष! तेरा मुझसे क्या नाता॥
धरती रुखी,नदिया सूखी,
चिड़िया,कोकिल-गइया रूठी।
घुला जहर हवा में ऐसा,
जीवन भी थर्राता
भूला मन राह भी अपनी,
धैर्य भी घबराता।
अपनेपन की बातें भूली,
प्रेम-प्रीत का नाता
स्वार्थ की गठरी को बांधे,
राही तू कित जाता
सच और ईमान भी छूटे,
योग्य न काम ही पाता।
कैसे मनाऊं खुशियां,
नववर्ष! तेरा मुझसे क्या नाता॥
कहाँ गई वो पड़ोसी बातें,
कहाँ गए गिल्ली-डंडे।
गुमे आम-चने भी अब तो,
चॉकलेट-पिज़्ज़ा है ललचाता
पगडंडियां गांव की सूनी,
पीपल-बरगद रोज बुलाता
चौपालों पर हँसी-ठिठोली,
अब चौपाटी पे जगराता।
खेत बगीचे चुप-चुप से हैं,
समय मॉल में बिक जाता
साथ बैठकर खाना भूले,
भाई,भाई पर गुर्राता।
कैसे मनाऊं खुशियां,
नववर्ष! तुझसे मेरा क्या नाता॥
दे सकता है वो रिश्ते,
वो जीवन की सौगातें तू।
भागदौड़ में भूल गए जो,
मधुर चांदनी रातें तू
सुबह सवेरे नमन बड़ों को,
और संध्या की बेला
भीड़ मशीनों की लगी है,
पर मन-सा रहा अकेला।
क्या तू लौटा सकता है,
आँखों के धूमिल सपने
दूर हुए जो तनिक बात पर,
वो मेरे सम्बन्धी अपने।
तभी मनाऊं खुशियां,
नववर्ष!तब तू मुझको भाता॥
कैसे कहूँ अपनों बिन,
जीवन नहीं सुहाता।
कैसे मनाऊं खुशियां,
नववर्ष! तेरा मुझसे क्या नाता॥

                                      #विजयलक्ष्मी जांगिड़

परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़  जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।

0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

साल जाते हैं,तो आते भी हैं

Mon Jan 1 , 2018
साल जाते हैं,तो आते भी हैं। ग़र ये रोते हैं,तो गाते भी हैं॥ ग़म के सागर में डुबोया इनने, किन्तु अपने हैं,तो भाते भी हैं॥ वक्त में कुछ खटाई-सी भर के, अह़सास-ए-ज़िंदगी ये कराते भी हैं। ले के जाते हैं ग़र ख़ुशियाँ सारीं, तो ये सौगात नई,लाते तो हैं॥ झूमकर […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।