राष्ट्रभाषा हिन्दी पर गर्व करो

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प्राचीनकाल में जब किसी भी सार्वजनिक-धार्मिक स्थल में विभिन्न धर्म,सम्प्रदाय या क्षेत्र के लोग मिलते थे,तब संस्कृत या हिन्दी भाषा का ही प्रयोग करते थेl तब कोई मजबूरी नहीं होती थी किसी अन्य विदेशी भाषा को अर्जित करने की,पर आज बहुत से लोग इंग्लिश भाषा की पैरवी करते हुए उसे एक बहुत समृद्ध और सशक्त भाषा कहते हैंl ज्ञान का भंडार भी उसमें ही मानते हैं जबकि,उसे समृद्धशाली इंग्लिश प्रेमियों द्वारा ही बनाया गया हैl इन प्रेमियों द्वारा ही हमारे समृद्ध ज्ञान के अनुवाद द्वारा ही कई बार डाका डालकर अपना ही साबित कर दिया गया। मैं कहती हूँ कि ज्ञान की कोई भाषा नहीं होती,बल्कि अपनी भाषा के माध्यम से जो ज्ञान अर्जित किया जाता है,वास्तव में वही सीखने में आसान होता है। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण विद्वान् विद्यार्थी भी बेवकूफ़ों में शुमार कर दिए जाते हैं,और बहुत बार वे कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। इससे हश्र यह होता है कि,जबरन इंग्लिश माध्यम से अपने बच्चों को पढ़ाना तथा गौरवान्वित महसूस करना और कराना। हम चाहते तो ज्ञान को अनुवाद के माध्यम से समझकर भी और अधिक समृद्धशाली बन सकते हैं जबकि,हमारे पास अति समृद्धशाली ज्ञान का भण्डार पहले से ही मौजूद है,जिसको विदेशी भी अनुवाद के ही माध्यम से ही सीख रहे हैंl कई बार तो डाका डालकर हम पर ही अपना झूठा प्रभाव डालते हैं,और हम बेवकूफ़ों की तरह उनको परमज्ञानी मानकर उन्हें प्रतिष्ठा प्रदान कर रहे हैं। कृपया बताएं कि,हम किस क्षेत्र में कमजोर हैं..लगता है हनुमान जी की तरह हम भी शापित हैं,जो हमें अपनी हिन्दी भाषा की समृद्धि का भान नहीं है। अनुरोध यही है कि,जागो,अपनी भाषा पर गर्व करो और उसकी समृद्धि को जानोl

                                                      #अलका गुप्ता ‘भारती’

परिचय : श्रीमती अलका गुप्ता ‘भारती’ मेरठ (उ.प्र.) में रहती हैं। काव्यरस-सब रस या मिश्रण आपकी खूबी है।आप गृहिणी हैं और रुचि अच्छा साहित्य पढ़ने की है। शौकिया तौर पर या कहें स्वांत सुखाय हेतु कुछ लिखते रहने का प्रयास हमेशा बना रहता है। आपके पिता राजेश्वर प्रसाद गुप्ता शाहजहाँपुर में एक प्रतिष्ठित एडवोकेट थे तो माता श्रीमति लक्ष्मी गुप्ता समाजसेविका एवं आर्य समाजी विचारक प्रवक्ता हैं। पति अनिल गुप्ता व्यवसायी हैं। १९६२ में शाहजहाँपुर में ही आपका जन्म और वहीं शिक्षा ली है। एमए (हिन्दी और अर्थशास्त्र) एवं बीएड किया है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएँ प्रकाशित होते हैं। पुस्तक-कस्तूरी कंचन,पुष्प गंधा नामक संकलन काव्य आदि प्रकाशित है। स्थानीय, क्षेत्रिय एवं साहित्यिक समूह से भी आपको सम्मान प्राप्त होते रहे हैं। ब्लॉग और फेस बुक सहित स्वतंत्र लेखन में आप सक्रिय हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।