“नर हो ,न अधम हो”

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यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक / लेखकों का है, मातृभाषा.कॉम का नहीं।

अधूरा नर,वैसे बिन नारी।
सूना घर ज्यों,बिन फुलवारी ।।
न हो अधम तू,बस मिथ्या में।
क्यों बनता है,अत्याचारी।।

न जन्म तेरा,होता रे संभव।
दुनिया मिलती,तुझको दुर्लभ।।
न ही पाता,माँ की ममता।
न होता सुत,आज्ञाकारी।।

सुख दुःख का,साथी न होता।
नखरे तेरे, कोई कभी न ढोता।।
श्वेत श्याम फिर,जीवन तेरा।
कोई न होती,बाट निहारी।।

यूँ सीप से मोती,हरने वाले।
नन्ही कली को,मसलने वाले।।
कैसे चलेगी,फिर ये दुनिया।
जब न होगी,बिटिया प्यारी।।

अधूरा नर,वैसे बिन नारी।
सूना घर ज्यों,बिन फुलवारी।।

*शशांक दुबे

लेखक परिचय : शशांक दुबे पेशे से उप अभियंता (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना), छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश में पदस्थ है| साथ ही विगत वर्षों से कविता लेखन में भी सक्रिय है |

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