कानून रोता है

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narendr pal

अरे!
ऐसे क्या देख रहे हो,
मुझे।
सिर्फ पट्टी बंधी है
मेरी आँखों पर..
अँधा नहीं हूँl 

मैं गांधारी हूँ

धृतराष्ट्र नहीं।


और हाँ,
मैं लचीला हूँ..
स्वयं टूटता नहीं हूँ
ये बात अलग है
कि मुझे तोड़ दिया जाता है,
लेकिन तुम्हारी आँखों पर
पट्टी तो नहीं है न…
फिर अनदेखा क्यों करते हो।


तुमने मुझे चीखते सुना होगा,
दामिनी के मुंह से…
निर्ल्लज होते भी सुना होगा।
कभी देहाती कुबड़ाई हुई
कमर की चाल में चलते
देखा होगा,
मेरी ही सीढ़ियों पर।


कभी खरीद-फरोख्त
की गई मेरी,
कभी बेबस भी हुआ..
कभी रखवालों ने लूटा
तो कभी जानकारों ने मरोड़ा।


मैं कभी सोता नहीं हूँ,
मुझे मूर्छित कर दिया जाता है
सच को डूबते देख
आपका ये
कानून भी रोता है,
लेकिन हाँ….
मैं गूंगा नहीं हूँ
जब बोलता हूँ तो
बराबर तोलता हूँl 


इन्साफ का तराजू है
कोई तवायफ के तन का
कपड़ा नहीं…..।

#नरेन्द्रपाल जैन

उदयपुर (राजस्थान)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।