ख़्याल कितने ख़्याली

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आज पहला दिन है गर्मियों की छुट्टियों का,एक अजब-सी बेफिक्री भी है,और गजब की फिक्र भी। बेफिक्री इस बात की कि,घड़ी का अलार्म बजने से पहले ही आंख खोलकिचन में घुसकर बच्चों के लिए दूध बनाकर देना,स्कूल का टिफिन बनाकर रखना। उफ्फफफ्,ये टिफिन में क्या  बनाकर देना है! यदि इस मुद्दे पर सोचने बैठो तो विश्व की जटिल-से-जटिल समस्या भी फीकी पड़ जाए। कभी- कभी तो समझ नहीं आता कि,हम ‘खाने’ के लिए जन्मे हैं या’खाना’ हमारे लिए जन्मा है? ‘टिफिन आइडियाज़’ पाने के लिए हम मांएं क्या नहीं करतीं? दिन में न जाने अपनी कितनी सहेलियों से फोन पर,व्हाट्सऐप पर इस गम्भीर समस्या पर चर्चा करते नहीं थकतीं। फिर भी रोज़ एक ही सवाल सुरसा राक्षसी के जैसे मुँह फाड़ता रहता है।
देखिए मैं कितनी अधिक प्रभावित और पीड़िता हूँ, ‘टिफिन समस्या’ पर बात क्या छेड़ी,पैराग्राफ कितना लम्बा लिख गई…lसुध ही न रही कि,मैं लिख रही हूँ,पल्लवी(सहेली) से फोन पर चर्चा नहीं कर रहीl अभी फिलहाल के लिए मैं ‘टिफिन समस्या’ की फाइल को छुपा लेती हूँ,क्योंकि मुझे आभास हो रहा है कि,मैं जो लिखने के लिए बैठी हूँ,उस विषय से खिसक गई हूँ(काश कि यहाँ मैं फेसबुकी इमोजी भी चिपका पाती)। हाँ,तो ये थी मेरी ‘अजब की बेफिक्री’। अब गजब की बेफिक्री ये है कि, बच्चे घर पर हैं और बार-बार पूछ रहे हैं-माँ खाने में क्या स्पेशल है? कुछ अच्छा बनाओ। अब लीजिए ‘आसमान से गिरे और खजूर पर अटके’…l अब खजूर पर अटकी हूँ तो थोड़े खजूर खा ही लेती हूँ। आपको भी चाहिए तो अभी बता दीजिए,कूद गई ऊपर से तो फिर न बोलिएगा-मेरे लिए भी खजूर तोड़ देती। वैसे भी खजूर का पेड़ मुझे खुद से नीचे पटकने की जहमत नहीं करेगा,कूदकर विषय पर लौट आऊँ जल्दी…।
अजब-गजब बेफिक्री के खजूर खा चुकी और आपको भी खिला दिए तो,पति महादेव को भी नाश्ता-पानी खिलाकर उनके लिए भी ‘टिफिन(यहाँ भी विराजमान)’ देकर मैं बैठ गई। सामने की सेन्ट्रल टेबल पर चार्ट पेपर के रंग-बिरंगें कागज़ लेकर,समझ ही चुके होंगें किस लिए! हाली-डे होमवर्क की तैयारी शुरू करवानी है। चुपचाप एकाग्रचित्त होकर इन रंगीन कागज़ों पर लकीरें खींच रही हूँ। यहाँ थोड़ी गम्भीरता आ रही है विचारों में,और अचानक एक बात कौंध उठी दिमागी आसमान पर..l`ख़्याल भी कितने ख़्याली होते हैं बाबा रे!! मजाल के दिलो-दिमाग की किसी एक शाख पर बैठ जाएं!!` पल में शरारत तो पल में शान्त,बड़े विचित्र,बड़े उन्मादी। मैं अब ख्यालों के साथ दूसरी शाख पर बैठने चली।
मैं अक्सर परेशान रहती हूँ इस बात को लेकर कि- कोरे कागज़ों पर मुझसे सीधी लकीरें नही खिंचतीं। कोरे कागजों पर लिखने बैठो तो लिखावट सीधी नहीं आती। कई पृष्ठों पर आदतन टेढ़ी लकीरें खींच,खुद की अक्षमता पर स्वयं ही खींजते हुए…तभी अचानक दिमागी बत्ती लुपलुपाई। आयताकार रंगीन कागजों के चारों किनारों को आधार बनाकर सीधी लकीरें खींच लकीरों का एक ‘फ्रेम’ बनाया,और फिर खड़ी और पड़ी रेखाओं के सहारा बना पटरी(स्केल) पर बनी लम्बी और इंच-सेमी की खड़ी लाइनों पर टिका सीधी लकीरें खींच डाली!!!! उफ्फ सफलता चाहे जिस भी रूप में मिले,जिस भी आकार में मिले,उल्लास भर देती है। यदि ठोकर खाकर आत्मानुभवों से मिले तो खुद को’गौतम बुद्ध’ से कम नहीं समझना चाहिए…हाहाहाहा…लगता है सफलता के जोश में कुछ अतिश्योक्ति हो गई।
फिलहाल आपको ‘कोरे कागज़` पर टेढ़ी लकीर से सीधी लकीर खींचने की `गौतम बुद्ध` बोध का वर्णन समझ आया कि नहीं! मैं इसमें खुद को फंसाना नहीं चाहती,बस आपको फंसाकर बाहर निकल ली।
अब मैं ख़्यालों की एक दार्शनिक शाख पर जा बैठी हूँ। सोच रही हूँ कि-जीवन भी इन चार्ट पेपरों की तरह अलग-अलग रंग लिए आता है,एकदम कोरा…इस पर हमें अपने कर्मों का लेख लिखना होता है। कुछ लोगों में इतनी सक्षमता होती है कि,उन्हें किसी सीधी लकीर को सहारा बनाकर अपने कार्मिक शब्दों का वाक्य विन्यास नहीं  लिखना पड़ता है। वे इतने आत्मविश्वासी होते हैं जो एक बार कलम उठी तो लिखावट में ढ़ृढता की सीधाई मत्रंमुग्ध कर देती है,तो कुछ मेरे जैसे होते हैं,जिन्हें लिखावट को सीधा रखने के लिए रेखाओं का आलंबन और अवलंबन फ्रेम बनाना पड़ता है,और सीधी लाइन खींचनी पड़ती हैं। यही नहीं,कई वर्षों के असफल प्रयास के पश्चात लाइन सीधी खींचने का ज्ञान दीप प्रज्वल्लित होता है।
नहीं जानती,इस सफलता का ‘माप’क्या है छोटी हैं या बड़ी..पर इस उपलब्धि का उल्लास अर्थपूर्ण रहा।
ख़्यालों की गतिशीलता हतप्रभ कर रही है। जब लिखने बैठी थी तो विचारों मे शरारत और चुटीलापन था,और अब चित्त शांत और धीर है। टाइपिंग की प्रकृति आत्मसंतोष को दर्शा रही है। ‘टिफिन समस्या’ भी जैसे कुछ पल के लिए चपलता से स्थिरता का रूख ले चुकी है। एक गहन दीर्घ निःश्वास के साथ लेखनी को विराम..शुभ दिनचर्या,शुभ ग्रीष्मावकाशl

                                                                                #लिली मित्रा

परिचय : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने वाली श्रीमती लिली मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इसी वजह से इन्हें ब्लॉगिंग करने की प्रेरणा मिली है। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन बेकिंग और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ माह पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा गृहिणि होकर बस शौक से लिखती हैं ,न कि पेशेवर लेखक हैं। 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।