आवार कुत्ता

0 0
Read Time22 Minute, 51 Second

चर्र-चूं’’ की आवाज निकालता दरवाजा उसने खोला था । उसे उम्मीद थी कि ‘‘शेरू’’ दरवाजे पर ही मिल जाएगा । उसका अनुमान सही निकला । दरवाजे की आहट पाकर शेरू चैतन्य हो गया था । आज दो दिनों के बाद दरवाजा खुला था । वो दिनों से यूं ही भूखा-प्यास दरवाजा खुलने की राह देख रहा था । रामलाल ने नजर भर कर शेरू को देखा । शेरू पूरी आत्मीयता के साथ उसके पास आकर खड़ा हो गया उसने सबसे पहले अपनी आदत के अनुसार रामलाल के पैरों को चूमा और फिर प्रश्नवाचक निगाहों से उनकी ओर देखा । रामलाल शेरू की हर हरकत को बहुत ध्यान से देख रहा था । वैसे तो वह शेरू की इस हरकत से परिचित ही था । शेरू उसका अपना पाला कुत्ता नहीं था । वो तो यूं ही मोहल्ले में घूमता रहता था । आने-जाने वालों पर भौंकता और कहीं से भी कुछ भी खाने को मिल जाता तो खा लेता । उसे आवारा कुत्तों से नफरत थी । वह जब घर आता जाता वह इन आवारा कुत्तों को अपनी लाठी से जरूर मारने का प्रयास करता । कुत्ते उसके इस हरकत से उस पर नाराज रहते और उसे देखते ही भौंकने लगते । रामलाल उनके भौंकने से डर जाता और बड़बड़ा अपने घर में घुसता । शेरू इसी जामात का हिस्सा था । उसे भी और कुत्तों की तरह रामलाल के प्रति नाराजगी थी । मोहल्ले में चार कुत्ते ही थे । पर चारों कुत्ते दिन रात धमाल मचाये रहते । मोहल्ले का हर निवासी उनसे नाराज रहता था । इसी नाराजी के चलते एक मोहल्ले वाले ने पत्थर फेंक कर मारा था जिससे शेरू की एक टांग जख्मी हो गई थी वह जख्मी हालत में बीच सड़क पर पड़ा था भूखा-प्यास । बाकी के कुत्ते उसे छोड़कर जा चुके थे । रामलाल शाम को जब मजदूरी करके घर लौट रहा था तब उसकी निगाह घायल शेरू पर पड़ी थी । वैसे तो उसे आश्चर्य हुआ था कि आज जब वह मोहल्ले में घुसा तब किसी कुत्ते ने उस भौंका नहीं ? जब उसने बीच सड़क पर पड़े शेरू को देखा तो सारा माजरा समझ में आ गया । पहिले तो उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ
‘‘सालों बहुत परेशान करते थे हम लोगों को अब भोगो, अच्छा हुआ …..अब पड़े रहो यूं ही……..’’ उसने भी दुतकार दिया था ।
कुत्ते को यूं जख्मी हालत में पड़ा छोड़कर वह अपने घर में भले ही आ गया हो पर उसका मन अभी भी कुत्ते में ही लगा था । उसने एक कोन में खटिया पर सो रही अपनी पत्नी को देखा । वह भी मजदूरी करने जाती थी एक दिन लोहे की राड उसके पैर के पंजों के आरपार हो गई थी । वह उसे अपनी गोद में उठाकर घर तक बड़ी मुश्किल में लेकर आ पाया था । वह दर्द से चीख रही थी । रामलाल उसे अस्पताल भी ले गया था पर उसे आराम नहीं लगा प्राइवेट अस्पताल में दिखाने की उसकी गुंजाइश नहीं थी सो उसने उसे यूं ही भगवान के सहारे छोड़ दिया था । उसका जख्म भर नहीं रहा था मवाद बनती जा रही थी । वह रात भर दर्द से रोती रहती थी पर रामलाल असहाय था । दिन भर की मशक्कत के बाद उसे जितनी मजदूरी मिलती थी उसमें उन दोनों का पेट भरना ही मुश्किल हो रहा था ऐसे में वह अपनी पत्नी का इलाज कराता भी तो कैसे । रोज काम पर जाने के पहिले वह चार मोटी-मोटी रोटियां सेंक लेता दो अपनी पत्नी के लिए छोड़ देता और दो रोटी खुद खाकर काम पर चला जाता । उसे दिन भर अपनी पत्नी की चिंता सताती रहती ।
सावित्री की नींद आहट से खुल गई थी । वह आंखें बंद किये ही समझ गई थी कि उसका पति रामलाल घर आ चुका है । उसने करवट बदलने ा प्रयास किया । जैसे ही उसका पैर हिला वह दर्द से कराह उठी । रामलाल उसकी खटिया के पास आ चुका था उसने बड़े प्यार से सावित्री के सिर पर हाथ रखा । सावित्री ने उसके हर संघर्ष में उसका साथ दिया है । हालाकि वह उसे जीवन में कुछ नहीं दे पाया जब शादी हुई थी तब भी वह मजदूरी करता था । एक मजदूर भला क्या दे सकता है वह अक्सर सोचता । शादी के कुछ दिनों के बाद ही वह सावित्री को भी अपने साथ काम पर ले जाने लगा था । उसे लगा था कि दोनों काम करेगें तो कुछ पैसा बचा पायेगें । वह तो खैर नहीं बचा पाया पर सावित्री जरूर थोड़ा बहुत बचा लेती थी । इन पैसों से ही वह दीपावली पर उसके लिए एक धोती और बनियान खरीद लाती और खुद के लिए एक साड़ी ले लेती । वे एक दिया में थोड़ा सा तेल भरकर लक्ष्मी जी की पूजन करते ं पर लक्ष्मी जी उन पर कभी प्रसन्न नहीं हुई । जैसे तैसे दोनों के जीवन की गाड़ी चल रही थी । संतान हुई नहीं ‘‘भगवान को ही मंजूर नहीं है, और संतान हो भी जाए तो उसे पालेगें कैसे…..अच्छा किया भगवान…..’’ रामलाल संतान न होने के दर्द को अपनी किस्मत मानकर खुश होने का नाटक कर लेता पर सावित्री को अक्सर यह बात खलती । सूनी कोख उसे परेषान करती । ‘‘अरे! संतान को पैदा मजदूरी करने के लिए करना चाहती है क्या…..ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है’’ रामलाल अपनी पत्नी के दर्द को ‘‘लोहा लाहे को काटता है की तर्ज पर काटने का प्रयास करता पर माॅ तो माॅ ही होती । सावित्री मौन ही रहती ।
सावित्री के सिर पर रामलाल ने हाथ रखा था उसे लगा कि सावित्री को तेज बुखार भी है । हाथ का स्पर्श पाकर सावित्री की आंखों से आंसू बह निकले ‘‘क्यों रो रही है पगली….’’रामलाल ने उस पर प्यार की बौछार की । सावित्री के आंसू अब आवारा हो चुके थे । दिन भर बहते रहते वह उन्हें पौंछने का प्रयास भी नहीं करती थी । ‘‘पानी………..पानी…..’’ सावित्री को बहुत देर से प्यास लगी थी । रामलाल सुबह जाते समय लोटे में पानी रख जाता था दिन भर वह उसे पीती रहती । पर आज उसे बुखार चढ़ा था इसलिए उसे प्यास ज्यादा लगी इस कारण पानी जल्दी ही खत्म हो गया । उसकी हिम्मत नहीं थी कि वह मटका से पानी भर कर ला सके । वह प्यासी ही पड़ी रही थी अब जब रामलाल आ गया तो उसकी प्यास ने जोर मारा ‘‘मुझे….प्यास….लगी है’’ । उसका जख्मी पैर फिर हिल गया वह दर्द से कराह उठी । रामलाल दौड़कर पानी लाया था । दो घूंट पानी पीकर ही वह बेहतर महसूस करने लगी थी । रामलाल ने सावित्री के जख्मी पैर को देखा । वह उस पैर की चोट को रोज देखता था । सुबह और शाम उसकी पट्टी बदल देता था । पट्टी बदलते समय सावित्री को बहुत वेदना होती थी वह उसे महसूस भी करता था । ऐसी ही वेदना उस कुत्ते को हो रही होगी । उसके मन में अभी भी कुत्ते के दर्द का अहसास बना था ।
रामलाल ने जख्मी कुत्ते को गोद में उठा लिया था । उसे यूं अपने हाथों में उठाता देख कुत्ता भयभीत हो गया था । वह रामलाल से उसकी दुश्मनी को जानता था उसे लगा कि आज रामलाल को मौका मिल गया है और वह उसे कहीं दूर फेंक कर आ जायेगा । उसने विरोध स्वरूप गुर्राने का प्रयास भी किया पर वह ऐसा नहीं कर पाया । उसने अपनी आंखें बंद कर ली थी ‘‘अब प्रभु ही मेरी रक्षा करेगें’’ । रामलाल आज उसके गुर्राने से भयभीत नहीं हुआ । वह उसकी पीड़ा का अहसास कर रहा था । उसकी पत्नी जिस पीड़ा से गुजर रही है कुत्तें को भी वैसी ही पींड़ा हो रही होगी । सोचते-सोचते उसकी आंखों से आंसू बह निकले । गोद में कुत्ते को उठाये रामलाल सावित्री की खटिया के नजदीक जा पहुंचा था । सावित्री ने कुत्ते के पैर से बह रहे खून को देखा वह विचलित हो गई । रामलाल ने बड़ी जतन से उसके पैर के जख्म को धोया और उस पर पट्टी बांध दी । धीरे-धीरे कुत्ते का जख्म तो भरता चला गया पर सावित्री का जख्म गहरा होता जा रहा था । रामलाल सुबह अब दो रोटी ज्यादा बनाने लगा था । उसने कुत्ता को शेरू कहना शुरू कर दिया था । शाम को जब वह लौटता तो सावित्री को दुलारता और शेरू को भी प्यार करता । शेरू उसके परिवार का सदस्य बन गया था ।
शेरू रामलाल के अहसान के तले दब चुका था । रामलाले ने ऐसे समय उसकी मदद की थी जब वह असहाय था । रामलाल चाहता तो उसे कहीं और फेंक कर आ सकता था पर रामलाल ने न केवल उसके जख्म का इलाज किया वरन उसे रोटियां भी दीं । रामलाल उसके लिए भगवान का रूप ले चुका था । वह रामलाल के कर्ज को उतारना चाहता था । उसके मन में रामलाल के प्रति श्रद्धा के भाव जाग चुके थे । वह रामलाल के काम पर जाने के बाद घर की रखवारी करता हांलाकि रामलाल के घर में ऐसा कुछ था ही नहीं जिसकी रखवाली की जा सके । फिर भी शेरू पूरे घर का चक्कर लगाता और दरवाजे पर आकर बैठ जाता । पहिले तो रामलाल काम पर जाने के पहिले दरवाज की कुडी लगाकर जाता था पर जब से शेरू उसके परिवार में शामिल हुआ तब से उसने दरवाजे को चुाला छोड़ना शुरू कर दिया था । उसे भरोसा था कि शेरू के रहते कोई घर के अंदर प्रवेश नहीं कर सकता । सावित्री को अब अकेलापन नहीं लगता था । वह दिन में कई बार शेरू को पुकारती और शेरू उसके पास पूंछ हिलाता हुआ आकर खड़ा हो जाता । उसे शेरू के होने से एक हिम्मत सी मिल गई थी । शेरू ज्यादातर समय तो घर पर ही रहा आता थोड़ी बहुत देर के लिए बाहर गली में घूमने अवश्य जाता । गली में हो-हल्ला मचाने के बाद वह वापिस सावित्री के पास आ जाता ।
रामलाल जब सुबह सोकर उठा तो उसे हरारत सी महसूस हुई । उसने अनदेखा किया । बहुत हिम्मत कर उसने नहाया और रोटियां भी बनाई । काम पर जाने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रहा था । वह अच्छी तरह जानता था कि उसे काम पर जाना ही पड़ेगा यदि काम पर नहीं गया तो उसकी मजदूरी कट जायेगी । पूरी हिम्मत जुटाकर वह काम पर चला गया । बीमार शरीर के साथ वह ज्यादा देर तक काम नहीं कर सका । वहीं गश्त खाकर गिर गया । साथ काम कर रहे मजदूरों ने उसे बड़ी मुश्किल से घर तक पहुंचाया । उसकी ऐसी हालत कर देखकर सावित्री चीख पड़ी । सावित्री का ले देकर एक ही तो सहारा था । रामलाल उससे प्यार भी तो कितना करता था । जब से वह ब्याह कर इस घर आई है रामलाल ने उसे कभी माॅ-बाप की याद तक नहीं आने दी थी । वे गरीबी में ही सही पर सर्दव एक दूसरे के सहारे जीते रहे हैं । रामलाल तो उसे काम पर भी नहीं जाने देना चाहता था उसकी खुद की जिद्द थी इसलिए रामलाल को मान लेनी पड़ी ‘‘हम दोनों काम करेगें तो दो पैसे ज्यादा आयेंगें……..कल को हमारी आन-औलाद होगी तो उन्हें पालने में भी तो पैसा लगेगा तब कहां से लाओगे’’ । आन-औलाद के भविष्य की चिंता के चलते रामलाल उसे काम पर ले जाने लगा था ये अलग बात है कि उनके आन-औलाद हुइ ही नहीं । काम पर भी रामलाल उसका पूरा ध्यान रखता, उसके आसपास ही बना रहता । उसे जब चोट लगी थी तो रामलाल दर्द से ऐसा कराहा था मानो चोट उसे ही लगी हो । चोट लगने के बाद उसने सावित्री को कभी खटिया से उठने तक नहीं दिया था । खाना खिलाता उसके कपड़े धोता और पूरी हमदर्दी रखता । उसी रामलाल को उसके मजदूर साथियों के कांधे पर सवार होकर आता देख सावित्री के होष उड़ गए । सावित्री की खटिया के पास ही बिछौना बिछा कर रामलाल को सुला दिया गया ‘‘कछु ंिचंता की बात नई है भौजी………बुखार चढ़ा है….ऐसे ही चढ़े बुखार में …………काम पर चले गए……….गष्त आ गया था………..’’ । मजदूर चले गए थे । सावित्री अपना दर्द भूलकर उसके माथे को सहलाती रही ।
शेरू ने भी रामलाल की हालत को देखा उसके चेहरे पर भी दर्द्र उभर आया था जिसे कोई नहीं पढ़ पाया । उसने रामलाल के चारों ओर घूमकर उसका हालचाल जानने की कोशिश की पर वह कुछ समझ नहीं पाया । उसे छोड़ने आये लोगों के चले जाने के बाद वह भी रामलाल के सिरहाने आकर बैठ गया उदास सा । उस दिन से घर में चूल्हा नहीं जला । रामलाल की हिम्मत दूसरे दिन भी बिछौना से उठने की नहीं हुई । उसने अपनी पत्नी को दर्द भरी निगाहों से देखा ‘‘अगर मैं नहीं उठ पाया तो सावित्री को भूखा रहना पड़ेगा………’’ उसने शेरू को भी उदास देखा वह समझ गया कि वह भी भूखा है उसने पूरी हिम्मत जुटाई ……..पर वह नहीं उठ सका उसने असहाय निगाहों से सावित्री की ओर देखा ‘‘आप…………पड़े …….रहो………..’’ वह इतना ही कह पाई । उसकी निगाह शेरू से भी टकराई । शेरू उन निगाहों का मतलब समझ गया उसने ‘‘कूं…कूं’’ करके …….उसे रोका था ’’।
शेरू जाने कहां से दो रोटी अपने मुंह में भरकर लाया और उसने रामलाल के सिराहने रख दी । रामलाल का चेहरा गुस्संे से लाल हो गया
‘‘भिखारी………….समझ……….लिया है…….भीख की ………रोटी……….देता है’’
शेरू को रामलाल की इस प्रतिक्रिया का अंदेशा नहीं था । उसे लग रहा था कि रामलाल और सावित्री दोनों कल से भूखे है…….वह दौड़ कर पड़ोस के एक घर में घुस गया था और वहां से दो रोटी लेकर आ गया था ताकि रामलाल और सावित्री के पेट में कुछ तो अन्न का दाना चला जाये । उसे अपना पेट भरने से ज्यादा जरूरी रामलाल का पेट भरना लग रहा था । रामलाल को यूं गुस्से में देख वह भयभीत हो गया उसने याचना भरी निगाहों से सावित्री की ओर भी देखा पर सावित्री आंखें बंद किये पड़ी थी । गुस्से से तमतमाये रामलाल ने शेरू को घर से निकालकर दरवाजे को बंद कर दिया । शेरू चुपचाप बंद दरवाजे के पास आकर बैठ गया था । दो दिन से वह ऐसे ही भूखा-प्यास बैठा दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहा था । गुस्से से तमतमाये रामलाल की आंखों से आंसू बहने शुरू हो गये थे । उसकी आंख जब खुली तो रात हो चुकी थी । पूरा घर अंधेरे में समाया हुआ था । उसकी निगाहें शेरू को ढूंढ़ रही थी । शेरू को घर से निकाले जाने का दुःख उसे महसूस होने लगा था ‘‘वह बेचारा तो उसके लिए रोटी लेकर आया था ’’ दुख से उसकी आंखों से आंसू बह निकले ।
बुखार उतरने में दो दिन का समय लग गया । वैसे तो रामलाल की हिम्मत आज भी नहीं पड़ रही थी पर वह जानता था कि दो दिन से घर में चूल्हा नहीं जला है सावित्री भूखी होगी । उसने निढाल पड़ी सावित्री को देखा तो वेदना से भर गया । चिन्ता तो उसे शेरू कर भी हुई । वह जानता था कि उसने भले ही शेरू को घर से भगा दिया हो पर शेरू कहीं जा नहीं सकता वह घर के बाहर ही बैठा होगा । पूरी हिम्मत जुटा कर वह घर से बाहर निकला । शेरू ने जैसे दरवाजे के खुलने की आवाज सुनी वह चैतन्य हो गया । उसने लाठी के सहारे दरवाजे से निकलते रामलाल को देखा । भूखे शेरू के शरीर में जैसे जान आ गई थी । उसने अपनी आदत के अनुसार रामलाल के पैरों को चूमा और उसके चक्कर लगाये अत्यधिक प्रसन्नता के कारण उसके मुंह से ‘‘कूं…….कूं’’ की आवाज निकल रही थी । रामलाल ने भी प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा । रामलाल रोटी का इंतजाम करना चाहता था कहीं से आटा मिल जाए या रोटी मिल जाए उसके पास पैसे नहीं थे वह काम पर जो नहीं गया था । लाठी टेकता रामलाल बनिए की दुकान की ओर बढ़ रहा था ‘‘कैसे भी करके सेठ से थोड़ा सा आटा उधार ले आउंगा…..कल से मजदूरी पर चला जाउंगा और सेठ का उधार चुका दूंगा…’’ उसे भरोसा था कि सेठ से इतनी जान पहचान है वह उधार दे ही देगा । शेरू उसके पीेछे-पीछे चल रहा था ।
सेठ ने उसे उधार देने से मना कर दिया था । गुस्सा और दुःख से उसकी आंखे भर आई थीं । वह तेज-तेज कदमों से घर की और लौट रहा था तभी पीेछे से एक मोटर ने उसे कुचल दिया । वह कराह के खून से लथपथ बीच सड़क पर गिर पड़ा । शेरू अचानक हुई इस घटना से पहिले घबरा गया फिर जैसे ही उसने रामलाल को खून से लथपथ सड़क पर गिरा पाया वह गुस्से से तमतमा गया । वह गाड़ी वाले के उपर चढ़ गया अपने नुकीले दांतों से उसने गाड़ी वाले को लहुलुहान कर दिया । फिर शेरू को रामलाल का ध्यान आया उसने अपने जबड़े से रामलाल को खींचना शुरू कर दिया । वह जानता था कि रामलाल का घर पास में ही है कैसे भी करके रामलाल को दरवाजे तक ले आये । वह अपने मंतव्य में सफल भी हो गया । उसने रामलाल को दरवाजे के पास छोड़ दिया और ख्ुाद उस भीड़ की ओर बढ़ गया । कुत्ता को यूं पागलों जैसी हरकतें करते देख आसपास खड़े सारे लोग लाठी लेकर उसे मारने दौड़े ।
शेरू लहुलुहान हो चुका था पर हिम्मत नहीं हार रहा था । रामलाल को दरवाजे पर छोड़ उसने सावित्री की ओर देखकर बहुत जारे से भौंका । सावित्री निढाल पड़ी थी उसके कानों में बाहर मची हलचल की आवाज पहुंच रही थी । शेरू न जब उसकी ओर देख कर भौंका तो उसे कुछ आंषका हुई । उसने खटिया से उठने का प्रयास किया पर सफल नहीं पाई । सावित्री के पास एक ही विकल्प था उसने खटिया से पलटी मार दी । उसके घाव लगे पेर से खून की धार लग गई वह दर्द से चीख पड़ी पर उसके पास कोई विकल्प था भी नहीं । वह यूं लुड़कते-पड़कते दरवाजे तक पहुंच चुकी थी । दरवाजे पर लहुलुहान पड़े रामलाल के उपर जैसी उसकी निगाह गई वह असहज हो गई ं उसने जोर से चिल्लाते हुए रामलाल को अपनी बांहों में ले लिया था । सावित्री के पैर से खून अनवरत बह रहा था । धीरे-धीरे उसका शरीर निढाल होता चला गया । रामलाल का श्ररीर तो पहिले से ही निढाल हो चुका था । दो निढाल शरीर के पास घायल शेरू बैठा रहा बहुत देर तक । लोगों की भीड़ जा चुकी थी । सुबह जब नया सबेरा हुआ तब न रामलाल जीवित था न सावित्री और न ही शेरू । शेरू का निश्चेत शरीर इन दोनों के शरीर के ऐसे उपर पड़ा था जैसे माॅ -बाप की आगोश में बच्चा सोता है ।

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर म.प्र.

matruadmin

Next Post

साहित्यकार अनिता मंदिलवार "सपना" को मिला नेशनल गोल्डन आर्टिस्ट अवार्ड 2020

Thu Dec 17 , 2020
साहित्यकार अनिता मंदिलवार सपना अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़ को पद्म विभूषण नंदलाल बोस नेशनल गोल्डन आर्टिस्ट अवार्ड 2020* से स्वदेश संस्थान के सौजन्य से सम्मानित किया गया । यह अवार्ड उत्कृष्ट रचना के लिए प्रदान किया गया है । अनिता मंदिलवार सपना की इसके पहले लगभग दो सौ साझा संग्रह और […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।