प्रश्न का उत्तर प्रश्न

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न दिल भरता है
न प्रभु मिलता है।
बस चारो तरफ
अफरातफरी का माहौल है।।

न प्रश्न बचे है
न उत्तर मिले है।
प्रश्नों पर प्रश्न ही
लोगो ने खड़े किये है।।

न समानता पहली थी
और न आज है।
पर बाते समानता की
हमेशा होती है।।

पर समानता आज भी
लोगो से कोषों दूर है।
क्योंकि सोच आज भी
लोगो के दिल मे वही है।।

गुजरा समय लौटकर
कभी आता नहीं।
वाण बातों का भी
वापिस आता नहीं।।

पहले और अब में
क्या बदल गया है।
सोच विचारकर देखो
कुछ तो समझ आएगा।।

इंसान बदला है या
उस की फिदरत।
कुछ तो सही बोलकर
समाज को बताओ।।

सुखी थे तो दुख भी
एक दिन आना था।
कालचक्र को संसार मे
अब तो घूमना ही था।।

बदल गई बहुतों की
किस्मतो की लकीरें।
इस महामारी में भी
इंसानियत धर्मनिभा पाये।।

जन्म लेकर बहुत आते है
पर सफलता कुछ ही पाते है।
कुछ तो अच्छा करके भी
सुख नहीं पा पाते है।

शायद उनके पूर्व जन्म के
कर्म ही सामने आ जाते है।
जिसके चलते अपने को
असहाय ही पाते है।।

जय जिनेन्द्र देव
संजय जैन (मुम्बई)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।