माँ

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priyanka
किन शब्दों में बयान करूँ मैं माँ को ? मेरे अस्तित्व का आधार,या मेरी श्वांसों में रची-बसी प्राणसुधा। मेरे व्यक्तित्व को रोशन करती लौ, या मेरे वजूद का बुनियादी ढाँचा। मेरी रुह में सम्मिलित रुहानियत,या मेरे संस्कारों की खुशबू….माँ को शब्दों में समेट पाना ,ईश्वर को परिभाषित करने जैसा है। अपनी यादों की गहराई में  जब भी झाँकती हूँ वह निर्मल-सी मुस्कान और वो बेहद मासूम-सा चेहरा निगाहों मेंं तैर जाता है। करीने से पहनी हुई कॉटन की कलफ लगी साड़ी,पूर्णतः सँवरी हुई माँ,सुबह से ही पूरे घर को ऊर्जा से भर दिया करती थीं। मैंनें माँ को कभी बेकार बैठे,व्यर्थ का प्रपंच करते या अव्यवस्थित नहीं देखा।
चूंकि वह महज एक गृहिणी ही नहीं,कामकाजी महिला थीं,अपने सभी काम यथासमय निपटाकर ,सभी ज़िम्मेदारी निर्वाह कर, हम बच्चों को भी बड़े लाड़-प्यार से पालतीं थीं। बेहद खूबसूरत तो वो थीं ही,बहुत गुणी भी थींं। पाक कला,चित्र कला, मूर्ति कला,क्राफ्ट और न जाने क्या-क्या….सब कुछ तो प्रवीणता से जानती थीं।
 दुनिया के समस्त प्रपंचों से दूर माँ ने हमें सदा स्वावलंबी बनाया। न बुराई करना पसंद था,न करने देती थीं….दुनिया से थोड़ी अलहदा परवरिश दी हमें…। हम तीनों की शादियों के बाद माँ काफी बीमार रहीं । सन 2010 में अचानक पापा के चले जाने के बाद माँ तो जैसे टूट ही गई। अपनी लम्बी बीमारी से लड़ते-लड़ते माँ हार गई। शिकायत कभी की नहीं उन्होंने किसी से। पापा की तेरहवीं के बाद जब उन्हें छोड़कर मैं लौट रही थी तो कलेजा फटा जा रहा था, पर माँ ने कहा-‘जाओ और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करो ,हम अच्छे से रहेंगे’.. न जाने इतना संबल कहाँ से ले आती थीं।
जीवन के अंतिम दिनों में साँसों को थामें माँ इंतजा़र कर रहीं थीं मेरा। अस्पताल में दाखिले की खबर जैसे ही मुझे मिली, मैं इंदौर से जबलपुर तक का वो अनंत सफर तय कर के माँ के पास पहुंची। मुझे देखकर माँ का चेहरा खिल उठा,आँखें चौड़ी कर माँ ने जी भर के मुझे देखा और मेरा हाथ थामे सो गई..रात को जब मैेंने माँ को देखा तो एक संतोष था उनके चेहरे पर।
 31 दिसंबर 2014 साल का वह अंतिम दिन हमारे लिए  भी उस स्वर्णिम युग का अंत साबित हुआ…माँ चली गईं…..यदि हो सके तो लौट आओ माँ,तेरी गोदी में सिर रख चैन की नींद सो जाने को,तुझे फिर से माँ कह पाने को करती रहती हूँ…इंतजा़र..।।।।

                                                                           #प्रियंका बाजपेयी

परिचय : बतौर लेखक श्रीमती प्रियंका बाजपेयी साहित्य जगत में काफी समय से सक्रिय हैं। वाराणसी (उ.प्र.) में 1974 में जन्मी हैं और आप इंदौर में ही निवासरत हैं। इंजीनियर की शिक्षा हासिल करके आप पारिवारिक कपड़ों के व्यापार (इंदौर ) में सहयोगी होने के साथ ही लेखन क्षेत्र में लयबद्ध और वर्ण पिरामिड कविताओं के जानी जाती हैं। हाइकू कविताएं, छंदबद्ध कविताएं,छंद मुक्त कविताएं लिखने के साथ ही कुछ लघु कहानियां एवं नाट्य रूपांतरण भी आपके नाम हैं। साहित्यिक पत्रिका एवं ब्लॉग में आपकी रचनाएं प्रकाशित होती हैं तो, संकलन ‘यादों का मानसरोवर’ एवं हाइकू संग्रह ‘मन के मोती’ की प्रकाशन प्रक्रिया जारी है। लेखनी से आपको राष्ट्रीय पुष्पेन्द्र कविता अलंकरण-2016 और अमृत सम्मान भी प्राप्त हुआ है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।