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shashank mishra
दशकों से आतंक को झेल रहे कश्मीर ने बुधवार को फिर 05 सीआरएफ जवानों को निगल लिया।यह आतंकी हमला अनंतनाग जिले में हुआ।चार अन्य सुरक्षाकर्मी घायल हुए।एक आतंकवादी भी मुठभेड़ में मारा गया।माना जा रहा है कि कम से कम दो आतंकियों ने अनंतनाग के व्यस्त केपी रोड पर सीआरएफ की गश्ती टुकड़ी पर हमला किया।उनके पास स्वचालित राइफलें थीं हथगोले भी फेंके।यह कोई आखिरी हमला नहीं है।इससे पूर्व जनवरी 2016 से कई बड़े बड़े हमले हुए हैं।पहला पठानकोट एयरबेस फिर उरी सेना के कैम्प नगरकोटा में आर्मी कैम्प श्रीनगर जम्मू हाइवे श्रीनगर बारामूला हाइवे पुलवामा पुलिस लाइन सुजना सेना कैम्प और फिर पुलबामा सीआरएफ काफिले पर हमला जिसमें चालीस जवान शहीद हुए।यह संख्या कुछ सालों की है पर दशकों से भारत मां ने अपने कितने लाल खोये हैं शायद उसका पूरा शरीर ही आंसुओं से भीग गया होगा।हृदय हर प्रहार दर प्रहार से छलनी होता जा रहा होगा।दूसरी ओर कितनों को विधवा होना पड़ रहा है नौनिहाल पिता का साया खो रहे हैं।बहिनें भाई और घर में माता पिता का सहारा छिन रहा है उनकी आंखों के आंसू नहीं सूख रहे हैं।देश और समाज में इस सबके के प्रति आक्रोश बढ़ रहा है।हर ओर से स्थायी समाधान की मांग उठने लगी है।
इस मामले पर बात करें तो कश्मीर को जानने वाले या विशेषज्ञ जो हैं वह दो तरह की बात करते हैं टीवी या सामने कुछ और पीछे कुछ अलग ही।स्थानीय राजनेताओं और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में इस मामले पर वैचारिक स्तर पर कभी समानता नहीं दिखती।दुःख तो सभी प्रकट करते हैं संवदनायें सबकी आती है पर कोई स्थायी समाधान के लिए सामने नहीं आता।दशकों से कितनी सरकारें आयीं चली गईं।कितनी बातें दावे हो गये।समानता यही रही कि देश हर सरकार में अपने सपूतों के शव गिनता रहा।वहां राजनीति होती रही। अपने अपने राजनीति भविष्य के लिए अधिक चिन्ता रही।कभी अन्दर की तो कभी बाहर की।नहीं तो क्या कारण है कि पंजाब शान्त हो सकता है असम में हिंसा समाप्त हो सकती है छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद मरणासन्न हो जाता है।पर कश्मीर की स्थिति ज्यों की त्यों रहती है।इनके आका और यह रक्तबीज की तरह बढ़ते ही रहते हैं।
सीमा पर सुरक्षा अन्दर सुरक्षा कई तरह के सुरक्षाबल अत्याधुनिक हथियार नवीनतम तकनीक से सुसज्जित हम और हमारे सुरक्षा बल हैं।पर आश्चर्य आतंकी हथियारों सहित मर्जी हो वहां पहुंच जा रहे हैं।जहां चाहते वहां वारदात को अंजाम दे रहे हैं।बड़े से बड़ा हथियारों का जखीरा उनके पास पहुंच जा रहा है।यही नहीं उनके समर्थन में कोई कमी नहीं हैं पहले जहां लड़के समर्थन में पत्थर बाजी के लिए निकलते थे अब लड़कियां भी सड़क पर आ रही हैं।हमारे सुरक्षाबल बंधे हाथों से इनको केवल समझाने का प्रयास करते ही बार बार दिखते हैं।सबको गम्भीरता से सोचना पड़ेगा कि आखिर हम हमारी सरकार सरकार के अंग सफल क्यों नहीं हो पा रहे हैं हम अपना नुकसान क्यों न रोक पा रहे हैं।यह रक्त बीज से प्रकट होते आतंकी हमको सुरक्षा बलों के शव गिनने पर विवश क्यों कर रहे हैं ।
वर्तमान में केन्द्र में जो सरकार है और जिनको रक्षा गृह और विदेश जैसे मंत्रालयों को सौंपा गया है।ऊपर से प्रधानमंत्री की कर्मठता कार्यकुशलता है।उसके बाद भी यदि कारणों तक जाकर निवारण न हुआ तो असंभव ही है और इस नासूर का भगवान ही मालिक है।कोई भी समस्या हो अगर निवारण करने वाला ईमानदारी से जुट जाये अपना सारा दम खम कौशल लगा दे तो समाधान होना ही है यहां पर सबके सब अनुभवी और हर तरह से कुशल हैं।अच्छे रणनीतिकार हैं।कुशलता से कूटनीतिक पहल करने वालों में हैं।अतः इस समस्या के स्थायी समाधान और कश्मीर को फिर से धरती का स्वर्ग बनने की आशा की जा सकती है।
चूंकि जम्मू और कश्मीर की स्थिति यहां पर होने वाली गतिविधियां पूरे देश पर प्रभाव डालती हैं।पूरे देश के लिए जो पैसा विकास योजानाओं में जाना चाहिए वह यहां सुरक्षा व्यवस्था या सुरक्षाबलों पर खर्च हो जा रहा है।इसलिए पूरे देश की जनभावना उसके द्वारा सरकार को मिले जनादेश का सम्मान करते हुए निर्णय होना चाहिए।सरकार में बैठे लोगों को केन्द्र और राज्य की राजनीति को करने वालों दलों व उनके नेताओं का अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अब जनता व देश का मन बदल रहा है।किसी प्रकार से क्षुद्रता स्वार्थ अरैर अपना अपना उल्लू सीधा करने वाली राजनीति वह बरदाश्त नहीं करेगी और आपका राजनीतिक अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा।अतः ऐसे कार्यों पर तत्काल विराम लगा दीजिए जिनसे इस राज्य की व्यवस्था खराब होने में किसी न किसी रूप में मदद मिलती है।समय की मांग के अनुसार सभी प्रकार के वाद समाप्त होकर केवल एक ही वाद दिखना चाहिए और वह हो कश्मीर के विकास उसकी सुख समृद्धि व शान्ति का जिसमें भी पूरे देश की भावनाओं का राष्ट्रीयता का समावेश हो।
सरकार को अगर इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर कुछ कठोर कदम उठाने की आवश्यकता अनुभव हो रही है तो बिना संकोच तत्काल उठाने चाहिए।केवल बड़ी बड़ी विकास योजनाओं या अन्य तरह से भारी भरकम धनराशि यूं ही न खर्च कर दी जाये उस पर पर्याप्त नजर हो उसके दुरुपयोग की सारी संभावनायें समाप्त कर दी जायें।स्थानीय स्तर पर लोगों को विश्वास में लिया जाये।उनकी सरकारी सुविधाओं अधिकारों व कर्तव्य को देश राज्य के लिए कर्तव्य से जोड़ दिया जाये।एक बार उल्लंघन करने पर चेतावनी देकर छोड़ दिया जाये।उसके बाद सारी सुविधाओं से विंचत कर दिया जाये।पत्थर बाजों को अगर नहीं मानते हैं तो सरकारी नौकरी हो राशनकार्ड मतदान या अन्य सरकारी सुविधायें पूरी तरह आजीवन प्रतिबन्धित कर दिया जाये।देश विरुद्ध षडयंत्र में शामिल या उसके लिए किसी प्रकार की सहायता सहयोग करने वालों के साथ देशविरोधियों सा कठोर व्यवहार हो।साथ ही पूरे जम्मू और कश्मीर में सभी प्रकार के हथियारों पर दस साल के लिए पूर्ण प्रतिबन्ध लागू हो अगर कोई हथियार बन्द दिखता है तो उसको बिना किसी चेतावनी के गोली मारने का अधिकार सेना के पास हो।स्थानीय पुलिस प्रशासन केन्द्रीय सुरक्षाबल अपनी गतिविधियों को आपस में साझा न करें बल्कि सीधे उच्चस्तर के अधिकारियों को दें वहीं तो इनको दिशा निर्देश मिलें और कुछ मिनट पूर्व ही अवगत कराया जाये।
उपरोत सुझाव कठोर लग सकते हैं मानवाधिकारवादी या अन्य कई लोगों को कष्ट हो सकता है कुछ दूसरे देश भी हो हल्ला कर सकते हैं पर आतंक और आतंकवादियों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए अब कोई दूसरा उपाय भी नहीं है।भयंकर रोग का इलाज करने के लिए दवा भी कड़वी ही देनी पड़ती है अतः सरकारों को इस दिशा में तेजी से आगे बढ़कर सैंकड़ों माताओं पिता बहनों विधवाओं और उनके बिन पिता के नन्हें नन्हें बच्चों की आंखों के आंसू पोंछने चाहिए।यही शहीदों के लिए सच्ची श्रृद्धांजलि होगी तथा इससे ही दशकों से भारत मां के लहूलुहान हो रहे मस्तक का वास्तव में मरहम होगा।उनका भारत माता की जय का नारा सार्थक हो जायेगा जो हर जगह लगवाते हैं अथवा अपनी सभाओं आयोजनों का आरम्भ करते हैं।

#शशांक मिश्र

परिचय:शशांक मिश्र का साहित्यिक नाम `भारती` और जन्मतिथि १४ मई १९७३ है। इनका जन्मस्थान मुरछा-शहर शाहजहांपुर(उत्तरप्रदेश) है। वर्तमान में बड़ागांव के हिन्दी सदन (शाहजहांपुर)में रहते हैं। भारती की शिक्ष-एम.ए. (हिन्दी,संस्कृत व भूगोल) सहित विद्यावाचस्पति-द्वय,विद्यासागर,बी.एड.एवं सी.आई.जी. भी है। आप कार्यक्षेत्र के तौर पर संस्कृत राजकीय महाविद्यालय (उत्तराखण्ड) में प्रवक्ता हैं। सामाजिक क्षेत्र-में पर्यावरण,पल्स पोलियो उन्मूलन के लिए कार्य करने के अलावा हिन्दी में सर्वाधिक अंक लाने वाले छात्र-छात्राओं को नकद सहित अन्य सम्मान भी दिया है। १९९१ से लगभग सभी विधाओं में लिखना जारी है। श्री मिश्र की कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। इसमें उल्लेखनीय नाम-हम बच्चे(बाल गीत संग्रह २००१),पर्यावरण की कविताएं(२००४),बिना बिचारे का फल (२००६),मुखिया का चुनाव(बालकथा संग्रह-२०१०) और माध्यमिक शिक्षा और मैं(निबन्ध २०१५) आदि हैं। आपके खाते में संपादित कृतियाँ भी हैं,जिसमें बाल साहित्यांक,काव्य संकलन,कविता संचयन-२००७ और अभा कविता संचयन २०१० आदि हैं। सम्मान के रूप में आपको करीब ३० संस्थाओं ने सम्मानित किया है तो नई दिल्ली में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वरिष्ठ वर्ग निबन्ध प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार-१९९६ भी मिला है। ऐसे ही हरियाणा द्वारा आयोजित तीसरी अ.भा.हाइकु प्रतियोगिता २००३ में प्रथम स्थान,लघुकथा प्रतियोगिता २००८ में सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति सम्मान, अ.भा.लघुकथा प्रति.में सराहनीय पुरस्कार के साथ ही विद्यालयी शिक्षा विभाग(उत्तराखण्ड)द्वारा दीनदयाल शैक्षिक उत्कृष्टता पुरस्कार-२०१० और अ.भा.लघुकथा प्रतियोगिता २०११ में सांत्वना पुरस्कार भी दिया गया है। आप ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं। आप अपनी उपलब्धि पुस्तकालयों व जरूरतमन्दों को उपयोगी पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध करानाही मानते हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-समाज तथा देशहित में कुछ करना है।

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