ऐ हवा

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कुछ तो है , जो बदल रहा है।
ना जाने ये , क्या चल रहा है?
जल रहा है जो एक दीया सदियों से।
ऐ हवा ! अब ये तुमसे क्यों लड़ रहा है?
बुझ तो नहीं रही रोशनी धीरे-धीरे।
या फिर और जोरों से जल रहा है?
मालूम है मुझे , ये नहीं बुझने वाला।
पर पीछे ये खंजर कुछ कह रहा है।
कहे भी तो क्या! अल्फ़ाज़ नहीं है पास।
महसूस हुआ है , कुछ तो बदल रहा है।
हवा की धमकी का ज़रा सा भी डर है तो-
यह जलता हुआ दीया क्यों नहीं डर रहा है?
अब आँधियाँ नफ़रत की भी चलने लगी हैं।
फिर ये दीया कैसे अब तलक लड़ रहा है?
क्या करूँ? एक बोझ सा है सीने पे।
लेकिन बांवरा ! क्योंकर मचल रहा है?
बदलों से अंदाजा है , बारिश भी आने को है।
फिर ये किस ख्वाबों के महल में जल रहा है?
मैं समझ न पाया तो फिर क्या समझाऊं इसे।
ऐ हवा! तेरे साथ वक्त क्या कर रहा है?
लगता है कुछ अहसास दिलाना होगा इसको।
ख़ामोश ज़ज़्बात अब ये नहीं समझ रहा है।
ऐ हवा!!

दिग्विजय ठाकुर
लखनऊ

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।