ऐ हवा

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कुछ तो है , जो बदल रहा है।
ना जाने ये , क्या चल रहा है?
जल रहा है जो एक दीया सदियों से।
ऐ हवा ! अब ये तुमसे क्यों लड़ रहा है?
बुझ तो नहीं रही रोशनी धीरे-धीरे।
या फिर और जोरों से जल रहा है?
मालूम है मुझे , ये नहीं बुझने वाला।
पर पीछे ये खंजर कुछ कह रहा है।
कहे भी तो क्या! अल्फ़ाज़ नहीं है पास।
महसूस हुआ है , कुछ तो बदल रहा है।
हवा की धमकी का ज़रा सा भी डर है तो-
यह जलता हुआ दीया क्यों नहीं डर रहा है?
अब आँधियाँ नफ़रत की भी चलने लगी हैं।
फिर ये दीया कैसे अब तलक लड़ रहा है?
क्या करूँ? एक बोझ सा है सीने पे।
लेकिन बांवरा ! क्योंकर मचल रहा है?
बदलों से अंदाजा है , बारिश भी आने को है।
फिर ये किस ख्वाबों के महल में जल रहा है?
मैं समझ न पाया तो फिर क्या समझाऊं इसे।
ऐ हवा! तेरे साथ वक्त क्या कर रहा है?
लगता है कुछ अहसास दिलाना होगा इसको।
ख़ामोश ज़ज़्बात अब ये नहीं समझ रहा है।
ऐ हवा!!

दिग्विजय ठाकुर
लखनऊ

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।