*बुखारी और दानव अधिकार आयोग*

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vaidik
कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की निर्मम हत्या का अर्थ क्या है ? यह हत्या उस समय की गई है जबकि रमजान का पवित्र त्यौहार चल रहा है। ईद आने को है। क्या इस हत्या को इस्लामी कहा जा सकता है ? क्या यह इस्लाम का सम्मान है ? या अपमान है ? ईद के मौके पर इतना घृणित पाप उस हत्यारे को कहां ले जाएगा ? दोजख में या बहिश्त में ? कश्मीर तो अपनी ऊंची संस्कृति के लिए जाना जाता है। ईद के मौके पर एक बेगुनाह और एक सच्चे कश्मीरी की हत्या किस बात का सबूत देती है ? क्या इसका नहीं कि आतंकवादियों ने कश्मीरियत की छाती को छलनी कर दिया है। आतंकवादियों ने सिद्ध किया है कि उनमें इंसानियत नाम की कोई चीज़ नहीं हैं और वे हद दर्जे के कायर हैं। शुजात बुखारी कोरे पत्रकार ही नहीं थे। वे कश्मीर की शांति के छोटे-मोटे मसीहा भी थे। वे भारत-पाक संवाद के पक्षधर थे। उनके दिल में किसी के लिए दुश्मनी नहीं थी। उनकी हत्या करके इन मूर्ख आतंकवादियों ने देश के सारे पत्रकार समाज को अपने खिलाफ खड़ा कर लिया है। स्वर्गीय शुजात भाई को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि !
इधर शुजात बुखारी की हत्या होती है और उधर संयुक्तराष्ट्र संघ के मानव अधिकार आयोग की रपट जारी होती है। इस रपट में भारत के खिलाफ जहर उगला गया है। आतंकवादियों को नेता कहा गया है। भारत सरकार पर तरह-तरह के उपदेश झाड़े गए हैं। पाक-अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बताया गया है। कश्मीर गए बिना ही अपने दफ्तर में बैठकर इस आयोग ने 49 पृष्ठ घसीट डाले हैं। भारत से कहा गया है कि वह कश्मीर में आत्म-निर्णय करवाए। जनमत संग्रह ! आयोग के अध्यक्ष जायद राद अल-हुसैन ने आतंकवादी गिरोहों को ‘सशस्त्र समूह’ कहा है। उन्हें वे ‘आतंकवादी’ नहीं बोल रहे हैं, जैसे गांव की हिंदू पत्नियां अपने पति का सही नाम बोलने से घबराती हैं। जायद हुसैन को शुजात बुखारी, अन्य निर्दोष नागरिकों और सेना के जवानों की होनेवाली नित्य हत्याएं बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ीं। इस रपट की भारत सरकार ने भर्त्सना की। ठीक किया। इसे कूड़े की टोकरी के हवाले करना चाहिए और जायद हुसैन को मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से बर्खास्त करने की मुहिम चलानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्रसंघ से हमें पूछना चाहिए कि यह मानव अधिकार आयोग है या दावन अधिकार आयोग ?
                                     #डॉ. वेदप्रताप वैदिक
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।