तुम्हारे लिए

2 0
Read Time51 Second

तुम्हारे ही लिए प्रियतम जहां को छोड़ आई थी,
मधुर क्रंदन बो मां चंदन का आंचल छोड़ा ही थी,

मेरे बाबा ने यू मुझको था सीचा अपनी बगिया में,
खिली जो फूल बन के तो तेरे चरणों चढ़ाई थी,

मेरे नन्हे से भाई ने बिठा डोली उठाई थी,
लरजते उन लबो की भी हंसी को तोड़ आई थी,

स्वयं गंगा उतरती थी, थी जब मैं खिलखिलाती थी,
चहक चिड़िया सी मैं प्रियतम धार वह मोड़ आई थी,

बो सावन झूले संग सखियां बिलखते नैन अब अखियां,
भूल उन रिश्ते नातों को तेरे संग जोड़ आई थी,

#पूजा विश्वकर्मा ‘बिट्टू’

नरसिंहपुर( मध्य प्रदेश)

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

उठो कलम के प्रखर साधकों, हिंदीमय भारत कर दो - डॉ अवध

Sun Sep 15 , 2019
होजोई। असम हिंदी साहित्य सभा और सर्व हिंदुस्तानी परिषद कछाड़ ने संयुक्त रूप से 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया। भव्य समारोह में कई गणमान्य कवियों के साथ मेघालय से आमन्त्रित सुविख्यात साहित्यकार डॉ अवधेश कुमार अवध को अंगवस्त्र के साथ प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश के […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।