हंसते हंसाते काम की बातें बताते रहे हैप्पी स्वामी !कथा-प्रवचन वाले शहर में हुआ ठहाकों का भंडारा

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इंदौर(कीर्ति राणा) ।
शहर में आए दिन कथा-प्रवचन-भंडारे तो होते रहते हैं लेकिन हैप्पी स्वामी की बातें एक तरह से ठहाकों का भंडारा था। लगा नहीं किसी संत को सुन रहे हैं, अहसास होता रहा अपने घर का कोई बुजुर्ग तीर्थाटन के बहुत दिनों बाद अपने बीच आया है और अपनी लंबी यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभव इस अंदाज में सुना रहा है कि इस जीवन यात्रा के अनुभवों में तुम्हें कुछ तुम्हारे काम का लगता हो तो गांठ बांध लो। सीख के इन हीरे-मोती को ना सहेजों तो मेरी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।
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तवलीन फाउंडेशन के जीएस नारंग हर साल जो आयोजन करते हैं वो कुछ अनूठा रहता है लेकिन फाउंडेशन का यह दसवां वार्षिक आयोजन अनूठों में भी अनूठा रहा। कब सवा घंटा बीत गया पता ही नहीं चला। जीएसआईटीएस के सभागार में हैप्पी स्वामी के नाम से ख्यात स्वामी अनुभवानंदजी सरस्वती ने ‘बस यही है जिंदगी मौज में रहो’  विषय पर हंसते रहे, हंसाते रहे और आसानी से दिलो दिमाग में उतर जाए इतनी सहज भाषा में बिना तनाव के जीवन जीने की बातें बताते रहे।उन्होंने जो कुछ कहा, उन्हीं के शब्दों में-
जब तक फॉरेन रिटर्न का ठप्पा न लग जाए कोई महाराज ही नहीं मानता।
हम में से कोई भी सीखने को तैयार नहीं, बदलने को तैयार नहीं, ऐसे में भगवान भी उसका कुछ नहीं कर सकते।जो सीखने को तैयार रहे, वही शिष्य है।
गुरु शिष्य के रिश्ते में गुरु के लिए सभी शिष्य समान होते हैं, लेकिन सीखता कोई एक शिष्य है, सौ कौरव-पांच पांडव में सीखने वाला अर्जुन ही रहा।
सीखने को लालायित रहेंगे तो आप को जीवन में हर दिन अनुभव प्राप्त होगा।
समस्या बाहर नहीं मन में है। गुरु बाहर से कुछ नहीं कर सकेगा। हमें अपनी अनुभूति से सीखना है तो ये संपूर्ण विश्व गुरु है।
हम हमेशा रसगुल्ला नहीं खा सकते, कुछ चटपटा-तीखा-खट्टा भी जरूरी है।ऐसे ही जीवन में थोड़े गम हों, थोड़ी खुशियां तभी तो जीवन का आनंद है।
जहां भी जाओ आनंद के माहौल में रहना, अपने दुख किसी को मत बताना।आप के दुख को जानने में किसी की रुचि नहीं है।किसी को खुश करने का प्रयत्न भी मत करना, भगवान ने हमें इतना कुछ दे रखा है फिर भी हम खुश रहते हैं क्या।
जिसके हृदय में विनोद है, हंसना जानता है, वह कभी दुखी नहीं हो सकता। हमें हरेक से, हर एक के अनुभव से सीखना है।हमने जीवन में सीखने का सिद्धांत सीखा नहीं, इसलिए हर पल दुखी रहते हैं।
पूरा विश्व आप को सीसीटीवी कैमरे की तरह नजर रख रहा है, आप कैसे बोलते, कैसे चलते, कैसे व्यवहार करते हैं यह लोग देखते हैं। आप किसी न किसी के लिए बड़े हैं।
हम सब किसी न किसी के लिए आदर्श हैं, इसलिए अपने व्यवहार में ऐसे रहें कि जो आप को आदर्श मानते हैं उनके दिलों पर चोंट ना आए।
सीखना मनुष्य के लिए सबसे ऊंची साधना है।
तुम्हें जो अच्छा लगे खाओ लेकिन दूसरे के खानपान को घटिया मत कहो। दुनिया में तीन प्रकार के खाने वाले हैं तीनों एक दूसरे को बेवकूफ समझते है।वेजिटेरियन वाले नॉन वेजिटेरियन को घृणा से देखते हैं। वेज वालों को वीगेन वाले घृणा से देखते हैं।
जो सामने आए प्रेम से खाओ, खाने के बाद भूल जाओ क्या खाया। खाने के बारे में कम से कम विचार करो।
गुजराती, मारवाड़ी इनको खाने और पैसे के सिवा कुछ नहीं सूझता। दिक्कत यह है कि हमें खाने की और फिगर की फिक्र रहती है। दिमाग में खाना, फिगर की चिंता भरी रहती है। हड्डी हड्डी (स्लिम) रहने के चक्कर में मत पड़ो। खूब डट के खाओ, मस्त रहो।
हमने अपने मन का ध्यान कब रखा। मन में विचार आते हैं तो क्या हम विचारक है। हमारा मन जंगल है या कि बगीचा। हमारे मन का खाना है विचार। हम मन का ध्यान नहीं रखते, जो चाहे पढ़ते, जो चाहे देखते हैं। देखो महाराज हम क्या खाना देते हैं मन को यह जरूरी है।
शरीर के स्वास्थ्य की तरह मन का स्वास्थ्य देखना भी जरूरी है।
मौन जो है यह मन की तपस्या है, मौन यानी अपने आप से बोलना बंद करो। करते उल्टा है, मौन में दूसरे के साथ बोलना बंद कर देते हैं और खुद मन ही मन बोलते रहते हैं।
कम से कम दस सैकंड अपने आप से मत बोलो, इसे कहते हैं हम कमोड योगा। जब कमोड पर बैठें अपने आप से बोलना बंद कर दो।
हम को सीखना है, यही सिद्धांत है जीवन का। तुलसीदास को (उनकी अति आसक्ति पर) उनकी पत्नी ने कहा था इतना ध्यान तुम राम की भक्ति में लगाते, बस तुलसीदास ने अपनी पत्नी की इस बात से सीख लिया।
जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन बहता रहता है, जीवन के इस बहाव में दुख के भंवर आते रहते हैं। दुख के निवारण के चक्कर में ना पड़े, केवल बेवकूफ दुखी होते हैं।जो दुखी है वो बेवकूफ है।दुनिया में प्रवेश पर ईश्वर ने इमिग्रेशन फार्म दिया था कि क्या तुम दुखी हो। हम सब दुखी अपनी च्वॉइस से होते हैं।
कृष्ण के जीवन में अनंत कष्ट आए लेकिन उनके चेहरे पर दुख नहीं था।जीवन में दुख के प्रसंग आने पर दुखी होने से इंकार करने को योग कहते हैं।
बिजली के खंबे पर भी डॉगी के पेशाब का दुख हो सकता है तो हम तो जीवित इंसान है।
हैप्पीनेस का मतलब है किसी से कोई शिकायत नहीं होना।
खुश होने का मतलब लॉफिंग क्लब ज्वाइन करने जैसा है।
जिनके जिम्मे दुख नहीं आता वो मुर्दा है।हमारा सिद्धांत है हम लीडर नहीं फालोअर बनते हैं।मुझे क्या करना है। जो फालोअर हैं वो हमेशा खुश हैं।
हम जगत में सीखने के लिए आए हैं। जिस जगत में आए हैं वह क्या है? वैकेशन पर जब आदमी जाता है तो मौज में रहता है। इसी प्रकार से हम जो संसार में आए हैं वैकेशन पर आए हैं खूब खर्चा करो, मौज करो। देखो महाराज, वैकेशन पर आने के बाद जाने की तैयारी करना है।
इस जगत में जब नहीं थे, तब कमी नहीं थी। हम चले जाएंगे तब भी जगत में कोई कमी नहीं रहेगी।
हमें रोज एक एक अनुभव से सीखना है।
कोरी कॉपी पर रोज लिखो आज क्या सीखा, एक साल में 365 दिन में इतनी सीख मिलेगी कि आप ज्ञानी हो जाओगे।मुझे यह भी पता है आप सब ऐसा करोगे नहीं। जिसको गुस्सा आता है वो आप की कमजोरी का प्रतीक है। जो गहराई में जीता है उसे गुस्सा नहीं आता।
संसार को अच्छा बनाने के लिए क्या करें, इस चिंता में मत पड़ो, दूसरे को सुधारने का तात्पर्य है हमने उन्हें बुरा माना है। प्रेम करो रे बाबा प्रेम करो, भगवान की बनाई कोई वस्तु गलत नहीं है। किसी को सुधारने का प्रयत्न करने का मतलब है भगवान को फेल करना, आकाश की नीलिमा को ग्रो ग्रीन करने का प्रयास करना।
प्रारंभ में संचालक संजय पटेल ने हैप्पी स्वामी का परिचय दिया, तवलीन फाउंडेशन के प्रकाशन की प्रति जीएस नारंग व टीम के सदस्यों ने भेंट की।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।