उम्र भर सवालों में उलझते रहे

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rupesh jain

उम्र भर सवालों में उलझते रहे, स्नेह के स्पर्श को तरसते रहे

फिर भी सुकूँ दे जाती हैं तन्हाईयाँ आख़िर किश्तोंमें हँसते रहे

आँखों में मौजूद शर्म से पानी, बेमतलब घर से निकलते रहे

दफ़्तर से लौटते लगता है डर यूँ ही कहीं बे-रब्त टहलते रहे

ख़ाली घर में बातें करतीं दीवारों में ही क़ुर्बत-ए-जाँ1 ढूढ़ते रहे

किरदार वो जो माज़ी2 में छूटे कोशिश करके उनको भूलते रहे

 जब भी मिली महफ़िल कोई, छुप के शामिल होने से बचते रहे

करें तो भी क्या गुनाह तेरा और लोग फिकरे3 मुझपे कसते रहे

कभी मंदिर के बाहर गुनगुनाते रहे तो कभी हरम में छुपते रहे

मिला ना कोई राही ‘राहत’ तुर्बत-ए-अरमान4 पर फूल सजते रहे

शब्दार्थ:

  1. क़ुर्बत-ए-जाँ :- जीवन की निकटता (कोई अपना सा)
  2. माज़ी :-अतीत
  3. फिकरे :- व्यंग
  4. तुर्बत-ए-अरमान :- आशाओं की क़ब्र 

#डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।