हमारे प्रिय नेताजी छीन-झपट कर बैठे न सुधरे जनता से छल-कपट कर बैठे सड़कें ख़राब थी बिजली भी नहीं आती हम बिजली के बटन चट-पट कर बैठे दिमाग़ आज हमारा बहुत ख़राब हुआ घर पर हम पत्नी से खट-पट कर बैठे अब बदला लेने की ठान ली थी इसलिए बाक़ी […]
rahat
सुना है ज़माने के साथ लोग बदलते हैं शहर में कुछ पीर आजकल भी रहते हैं आँख भरके देखते हैं क़द्र न की जिसने मचलते हैं क्यों इतना पूँछ के देखते हैं चाँद से बढ़ कर रोशन सादगी जिनकी हर दिन वो शान से बाहर निकलते हैं हुजूम से परे उन पर निगाहें ठहर गई तितलियाँ मँडरातीं हैं शायद महकते हैं उतरे चेहरे सँवार के भी ख़ामोश बहुत जहाँ भर की ख़ुशी आस पास रखते हैं तिरे पीछे तिरि परछाँइयों से की बातें चश्म हैराँ मिरि अक़्स कमाल करते हैं मुंसिफ-ए-बहाराँ तिरि एक नज़र को ‘राहत’ तेरे कूचे से दिन रात गुजरते हैं #डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
जन्नत के बहाने क्यों दोज़ख़ की तरफ़ ले जाते हो ए जिहाद वालों क्यों तुम मासूमो को बरगलाते हों। बताओ कौन से ख़ुदा ने कहा है पाक है क़त्ल-ए-इंसाँ ख़ुदाई में वो अपनी मोहब्बत करने को तुमसे कहता है। हूर की बात तुम करते हो जो जन्नत में मिलेगी पर क्यों छुपाते हो, दोज़ख़ भी न मिलेगा इस ख़ूनी खेल के बाद। इशरत-ए-इंसाँ है मोहब्बत में मिट जाना फिर क्यों नफ़रत में जल के औरों को जलाते हो। साजिशों में क्या रखा हैं गुनाहों के अलावा क्यों तुम इस कायनात में गड़बड़ी फैलाते हो। फ़राइज़ तले गुज़ारिश है तुमसे जिहाद वालों छोड़कर राह-ए-कुफ़्र अमन से ज़िंदगी बिता लो। #डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं सूरज से डरते हैं इसीलिये दिन में छिप जाते हैं। चाँद से शरमाते हैं पर आकाश में निकल आते ह़ैं तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं। लोग कहते हैं अंतरिक्ष अनंत ह़ै लेकिन मैंने देखा नहीं मैं तो केवल इतना जानता हूँ सूरज बादल में छिप जाता है चाँद बादल में छिप जाता है सो तारे जब डरते शरमाते होंगे बादल में छिप जाते होंगे। तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं। #डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
