शिव दोहावली

sanjeev
शिव ने शक का सर्प ले,
किया सहज विश्वास।
कण्ठ सजाया,धन्यता
करे सर्प आभास।
द्वैत तजें,अद्वैत वर,
तो रखिए विश्वास।
शिव-संदेश न भूलिए,
मिटे तभी संत्रास॥
नारी पर श्रद्धा रखें,
वही जीवनाधार।
नर पर हो विश्वास तो,
जीवन सुख-आगार॥
तीन मेखला तीन गुण,
सत्-शिव-सुंदर देख।
सत्-चित्-आनंद साध्य तब,
धर्म-मर्म कर लेख॥
उदय-लय-विलय तीन ही,
क्रिया सृष्टि में व्याप्त।
लिंग-वेदिका पूजिए,
परम सत्य हो आप्त॥
निराकार हो तरंगित,
बनता कण निर्भार।
भार गहे साकार हो,
चले सृष्टि-व्यापार॥
काम-क्रोध सह लोभ हैं,
तीन दोष अनिवार्य।
संयम-नियम-अपरिग्रह,
हैं त्रिशूल स्वीकार्य॥
आप-आपके-गैर में,
श्रेष्ठ न करते भेद।
हो त्रिनेत्र सम देखिए,
अंत न पाएं खेद॥
त्रै विकार का संतुलन,
सकल सृष्टि-आधार।
निर्विकार ही मुक्त है,
सत्य क्रिया-व्यापार॥
जब न सत्य हो साथ तो,
होता संग असत्य।
छलती कुमति कुतर्क रच,
कहे सुमति तज कृत्य॥
नग्न सत्य को कर सके,
जो मन अंगीकार।
उसका तन न विवश ढहे,
हो शुचिता-आगार॥
                           #संजीव वर्मा सलिल

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