मेरे गांव के बच्चे

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सुना है अब मेरे गांव के,
सारे बच्चे बड़े हो गए…
कोई हिन्दू तो कोई,
मुसलमान हो गए…
खैर ये तो मजहब की बात है,
पर वे बड़े छुपे रुस्तम से हो गए…
यकायक ही एक दुजे के,
वो दुश्मन से हो गए…
पलट कर देखा जब जिदंगी को,
कुछ हसीन लम्हे याद आ गए…
वो मजे,वो खेल और ..
माहौल याद आ गए…
वो जमाने भी क्या रंग-बिंरगे थे,
जब सबके हाथ में तिंरगे थे…
गांव-गांव गली-गली पैगाम थे,
तिंरंगे के ही चर्चे सरेआम थे…
सब बच्चे मासूम थे,
सबके सब इंसान थे…।
वे बच्चे अब बड़े हो गए,
तिंरगे के रंग आपस में बंट गए…
कोई केशरिया हो गए,
तो कोई ‘हरे’ भरे हो गए…
तो कोई ‘निला’म य हो गए…
बचे-खुचे कुछ ‘मा’ ओ के लाल,
अब सच में ‘लाल’ म ‘लाल’ हो गए…
कुछ तो मालामाल हो गए
तो कुछ जिंदगी के बोझ को,
ढोते-ढोते बेहाल हो गए…
मेरे गांव के बुरे हाल हो गए,
सच में मेरे गांव के बच्चे
अब ‘बड़े’ हो गए…॥

#संजय वासनिक ‘वासु’

परिचय : संजय वासनिक का साहित्यिक उपनाम-वासु है। आपकी जन्मतिथि-१८ अक्तूबर १९६४ और जन्म स्थान-नागपुर हैl वर्तमान में आपका निवास मुंबई के चेंबूर में हैl महाराष्ट्र राज्य के मुंबई शहर से सम्बन्ध रखने वाले श्री वासनिक की शिक्षा-अभियांत्रिकी है।आपका कार्यक्षेत्र-रसायन और उर्वरक इकाई(चेम्बूर) में है,तो सामाजिक क्षेत्र में समाज के निचले तबके के लिए कार्य करते हैं। इकाई की पत्रिका में आपकी कविताएं छपी हैं। सम्मान की बात करें तो महाविद्यालय जीवन में सर्वोत्कृष्ट कलाकार-नाटक सहित सर्वोत्कृष्ट-लेख से विभूषित हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-शौकिया ही है।

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