अरमानों के पंख लगाकर,
दूर गगन उड़ने तो दो।
सृष्टि-सृजन जन-मन को,
कुछ मनोरंजन करने तो दो।
कब तक जंजीरों में आखिर,
कैद रहेगी ये गुड़िया ?
गुड़िया तो गुड़िया है आखिर !
न तो है यह काँच की…
और न कागज की पुड़िया।
कितनी सदियां बीत गईं हैं,
कितने आँसू रीत गए।
कितने थे अब नहीं रहे जो,
कितनों के क्या छूट गए।
बड़ी बदल का साक्षी बनकर
भी तो ..
इंसान नहीं बदले।
अपने अंदर के पशु को,
कैसे कहे जरा सम्भले।
जिससे है अस्तित्व,
उसी को कैद किए जाता है क्यों ?
शत्रु अजात,औरंगजेब-सा…
खुद को दिखलाता है क्यों ?
रे मानव !
क्या मूढ़ हुआ है ?
इतना इतराता है क्यों ???
#निकेता सिंह `संकल्प`(शिखी)
परिचय : निकेता सिंह का साहित्यिक उपनाम-संकल्प(शिखी) है। जन्मतिथि- १ अप्रैल १९८९ तथा जन्म स्थान-पुरवा उन्नाव है। वर्तमान में वाराणसी में रह रही हैं। उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव-लखनऊ शहर की निकेता सिंह ने बीएससी के अलावा एमए(इतिहास),बीएड, पीजीडीसीए और परास्नातक(आपदा प्रबंधन) की शिक्षा भी हासिल की है। आपका कार्यक्षेत्र-शिक्षण(शिक्षा विभाग) है। आप सामाजिक क्षेत्र में शिक्षण के साथ ही अशासकीय संस्था के माध्यम से महिलाओं एवं बच्चों के उत्थान के लिए कार्यरत हैं। लेखन में विधा-गीतकाव्य, व्यंग्य और ओज इत्यादि है। क्षेत्रीय पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती हैं। सम्मान के रुप में आपको क्षेत्रीय कवि सम्मेलनों में युवा रचनाकार हेतु सम्मान मिला है। आप ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय हैं तो उपलब्धि काव्य लेखन है। आपके लेखन का उद्देश्य-जनमानस तक पहुँच बनाना है।
Sat Jan 13 , 2018
जब भी बैठती हूँ, खुद के साथ अपनी हथेलियों को बड़े गौर से देखती हूँl आड़ी-तिरछी इन लकीरों, में न जाने क्या खोजती हूँl सिकोड़कर कुछ गाढ़ी, खिंची लकीरों की गहराई नापती हूँl पता नहीं,इन गहराइयों में, खुद को कहाँ तक डूबा देखती हूँ ?? सोचती हूँ,क्या सच में मेरी, […]
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