वक्त का पहले से…मारा हूँ मैं।
आसमाँ से टूटता…तारा हूँ मैं॥
घूमने की कामना…जगती रही।
क्यूँ कहें सब आज आवारा हूँ मैं॥
जिसको चाहा वो नहीं मिलती मुझे।
बस उसी से आज तक हारा हूँ मैं॥
क्यूँ नहीं मिलती…मंजिल मुझे।
बस नदी की भटकी-सी धारा हूँ मैं॥
जिन्दगी तो खार ही देती रही।
अब तो सागर जल-सा ही खारा हूँ मैं॥
मतलबी लोगों ने घेरा है मुझे।
आज तक उनका रहा चारा हूँ मैं॥
की नहीं माँ-बाप की इच्छा पूरी।
आगे उनके आज नाकारा हूँ मैं॥
भागता ही कर्म से तो…दूर हूँ।
और कहता खुद को बेचारा हूँ मैं॥
#सुनीता उपाध्याय `असीम`
परिचय : सुनीता उपाध्याय का साहित्यिक उपनाम-‘असीम’ है। आपकी जन्मतिथि- ७ जुलाई १९६८ तथा जन्म स्थान-आगरा है। वर्तमान में सिकन्दरा(आगरा-उत्तर प्रदेश) में निवास है। शिक्षा-एम.ए.(संस्कृत)है। लेखन में विधा-गजल, मुक्तक,कविता,दोहे है। ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय सुनीता उपाध्याय ‘असीम’ की उपलब्धि-हिन्दी भाषा में विशेषज्ञता है। आपके लेखन का उद्देश्य-हिन्दी का प्रसार करना है।