आज ठण्ड बहुत ज्यादा थी,कोहरा भी छाया हुआ था। सर्द मौसम में पड़ोस की गली सूनी पड़ी थी,जहां हर समय
छोटे-छोटे बच्चों का शोर बना रहता है, पर सब आज अपने कच्चे-पक्के मकानों या कहें कि,झोपड़ियों में दुबके हुए थे। जिनके तन पर गर्म कपड़ों की बात तो दूर,तन ढंकने को भी लिबास मयस्सर नहीं थे,वो इस ठण्ड में कैसे खेलते-कूदते ? सब बेबसी में दुबके हुए थे। उसका मन कसेला-सा हो गया। प्रभु की कैसी लीला थी-एक तरफ तो धनवानों की बड़ी-बड़ी कोठियां और पिछवाड़े नंगे बदन मासूमियत…शरारती ठण्ड ने हंसी छीन ली थी उन मासूमों की। उससे रहा नहीं गया। वो रोज उस गली से गुजरती थी, जहाँ उन बच्चों की शैतानी,मासूम बदमाशियां और फिर हाथ जोड़कर ‘नमस्ते मेडम..’ होंठों पर मुस्कराहट के साथ लाकर कहना और छुप जाना। वो उनकी भोली शरारत पर निहाल हो जाती थी। उसका मन करता कि,इनको खूब प्यार करुं,इनके लिए कुछ करुं। वह खुद भी लाचार थी,पर आज उसने ठान लिया कि कुछ तो करेगी,और उसने घर में जितने भी पुराने गर्म कपड़े जो उसके पोते-पोतियों को नहीं अाते थे तथा शाल-स्वेटर-कम्बल सब लेकर चल पड़ी। पड़ोसियों ने देखा तो कहने लगे-इतनी ठण्ड में कहां जा रही हो पोटला ले के! जब उसने सारी बात बताई तो बोली-रुको,मैं भी चलती हूं। जब हम वहां पहुंचे तो दुबका बचपन खिलखिला पड़ा कि, अब हमको ठण्ड से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ेगी,और डरना नहीं पड़ेगा। गर्म कपड़े देखकर उनके माता-पिता हाथ जोड़कर कृतज्ञ नजरों से देख रहे थे,शायद उसके मन में भी अब संतुष्टि के भाव थे।
#श्रीमती राजेश्वरी जोशी
परिचय : श्रीमती राजेश्वरी जोशी का निवास अजमेर (राजस्थान) में है। आप लेखन में मन के भावों को अधिक उकेरती हैं,और तनुश्री नाम से लिखती हैं।