रक्त आज भी भभक उठा,
उस दिवस को याद कर
जब काली थी अजब घटा,
और शीतकाल का समर
वज्र से थे हस्त भी,जो ढाने बाबरी चले,
स्वयं बलि के दूत थे,जो लाने नरबलि चले
जोश था जुनून था,शौर्य का सुरूर था,
होश बेहिसाब था,सख्त-सा गुरूर था
नेत्र में असत्य की शिलाओं पे जो क्रोध था,
अधर्म से गढ़ी इबारतों के उत्तरों का रौद्र था
मुख पे राम बोल था कंठ में शिवोम् था,
तोड़ने उन गुम्बदों को भक्त रोम-रोम था
हाथ में न शस्त्र था फिर भी वो प्रशस्त था,
जीत का न हार का वो राम का ही अस्त्र था
मति ने आतताईयों की कितने रोड़े डाले थे,
तंत्र के कसाईयों ने कितने फंदे फांसी के बुने
ये याद भी जहर के इतनी घूंट जैसी बन गई,
कि सादगी भी अब हमारी शौर्यता-सी बन गई
फैसलों से चलने वाले रामभक्त हम नहीं,
उदघोष की आवाज़ भी धैर्य से थमी रही
अब घड़ी है आ गई भगवे की पुकार से,
अयोध्या की पुकार से आएंगे हम शान से॥
#रजनीश दुबे’धरतीपुत्र'
परिचय : रजनीश दुबे’धरतीपुत्र' की जन्म तिथि १९ नवम्बर १९९० हैl आपका नौकरी का कार्यस्थल बुधनी स्थित श्री औरोबिन्दो पब्लिक स्कूल इकाई वर्धमान टैक्सटाइल हैl ज्वलंत मुद्दों पर काव्य एवं कथा लेखन में आप कि रुचि है,इसलिए स्वभाव क्रांतिकारी हैl मध्यप्रदेश के के नर्मदापुरम् संभाग के होशंगाबाद जिले के सरस्वती नगर रसूलिया में रहने वाले श्री दुबे का यही उद्देश्य है कि,जब तक जीवन है,तब तक अखंड भारत देश की स्थापना हेतु सक्रिय रहकर लोगों का योगदान और बढ़ाया जाए l