संताप

sneh prabha
मोहन बाबू और रमेश बाबू गाँव के सबसे बड़े जमींदार कहलाते थे,जमींदारी प्रथा तो समाप्त हो गई थी लेकिन जिसकी ज्यादा जमीन होती थी, वो जमींदार ही कहलाते थे। दोनों में दोस्ती थी,एक दूसरे में अटूट प्रेम था ।
मोहन बाबू चार बेटियों के पिता थे, इसलिए उनको ये चिंता हमेशा लगी ऱहती थी कि,एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हो जाती तो..मेरा वंश चलता,और इतनी सम्पत्ति को भोगने वाला वारिस तो चाहिए? बेटी का क्या है,ब्याह कर देंगे पराई हो जाएगी।
ससुराल सम्हालेगी,क्या मुझे  देखने आएगी। इधर ऱमेश बाबू के माशाअल्लाह दो बेटे थे। अब तो वो गाँव में तनकर चलते,और कहते-अरे मोहन को तो देखो,चार-चार बेटियाँ है,दामाद खोजते-खोजते हालत खराब हो जाएगी,कहकर ठठाकर हँसते भी।
मोहन बाबू सुबह-सुबह काफी कलफदार कपड़े,पैर में चमरखानी जूते पहनकर खेतों की तरफ निकल गए। लहलहाती फसलों को देखकर वे गदगद हो गए।
खेतों के चारों तरफ घूम रहे थे कि,दूर से सुरेशवा दौड़ते हुए आया।सुरेशवा जो मोहन बाबू के खेत में काम करता था ,वो बोला-मालिक हमार टोला में नी एक पंडितवा आयल रहे। वो बोला कि पूजा, पाठ ,हवन, दान पुन करला से बेटवा के जन्म हो जाला।
मोहन बाबू खुश हो गए और सुरेशवा को बोले-जा पंडितवा के बुला के लावो।
मोहन बाबू ने खुश होकर पत्नी को सारी बात बता दी और  घर में पूजा की तैयारी शुरू कर दी गई।
पंडित जी तय समय पर पहुँच गए। दो-तीन घंटे में सब पूजा पाठ हो गया। मोहन बाबू ताबीज पहनकर अब पुत्र प्रप्ति की कल्पना करने लगे।
समय निकलता गया,बेटियाँ बड़ी हो गई,और पंडित जी की भविष्यवाणी गलत ही निकली।
ऐसे में हार मानकर और भाग्य पर छोड़कर मोहन बाबू बेटियों की चिंता करने लगे। चारों बेटी ने स्कूल की पढ़ाई गाँव में की,लेकिन बाहर जाकर पढ़ने की इजाजत नहीं  मिली ।
एक-एक कर तीन बेटियों की शादी की,लेकिन सबसे छोटी बेटी पढ़ने में बहुत तेज थी,तो वो चिकित्सक बनना चाहती थी। उसने पिता के मन को टटोलकर उनको मना लिया,और आगे पढ़ने के लिए बाहर चली गई।
इधर रमेश बाबू काफी खुश थे और अपने भाग्य पर इठलाते हुए पत्नी से बोले-ये मोहन निसंतान ही रह गया, अब तो सुबह सुबह इसका चेहरा भी नहीं देखना चाहते हैं। पत्नी बोली-क्यों ? अरे तुम नहीं समझती हो, बड़ी भोली हो,ऐसे लोगों का चेहरा देखना मनहूसियत है।
ऱमेश बाबू का बेटा पढ़ लिख-कर बाहर नौकरी करने लगा। घर धीरे-धीरे खाली हो गया,इसी एकाकीपन से उनकी पत्नी बीमार रहने लगी। बीमारी दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गई,और एक दिन वो भी आया कि उनका स्वर्गवास हो गया।
इधर मोहन बाबू और उनकी पत्नी भी अकेले हो गए,सब बेटी ससुराल चली गई। छोटी बेटी ने भी चिकित्सक बनकर अपनी पसंद से शादी कर ली।
अब रमेश बाबू अकेले जिन्दगी जी रहे थे। पत्नी के जाने के बाद वो काफी कमजोर नजर आ रहे थे।
बेटे से फोन पर बात हो जाती थी,लेकिन कभी कोई देखने नहीं आता,न कोई खबर लेता था। इसके विपरीत मोहन बाबू की एक न एक बेटी हमेशा माँ-पिता की देख-रेख में लगी रहती।
जब रमेश बाबू काफी बीमार रहने लगे तो,बेटे को फोन कर आने को कहा। बेटा बोला-गाँव की जिन्दगी ठीक नहीं है, आपके पोते-पोती,बहू कोई आना नहीं चाहते। आप  कोई आदमी रख लीजिए,आपको पैसे की कमी तो है नहीं। तब मोहन बाबू की बेटियों द्वारा आवभगत देखकर ऱमेश बाबू बोलते हैं-‘काश हमें भी एक बेटी होती।’

                                                          #स्नेह प्रभा पाण्डेय

परिचय: १९५४ में ७ जुलाई कॊ जन्मीं स्नेह प्रभा पाण्डेय का जन्म स्थान-बिहार राज्य है। आप स्नातक तक शिक्षित तथा गृहिणी के रुप में कार्यरत हैं। आपका वर्तमान और स्थाई निवास शहर-धनबाद(राज्य -झारखण्ड) ही है।सामाजिक क्षेत्र में आप मानववाधिकार संगठन में महिला इकाई सहित अन्य से भी जुड़कर बेटियों की बेहतरी के लिए काम करती हैं। आपका रचनाकर्म अतुकांत है,वैसे लघुकथा भी लिखती हैं। कुछ साहित्यिक समूहों से भी जुड़ी हैं। आपके लेखन कार्य का उद्देश्य-अपनी संतुष्टि और समाज की कुरीति को उभारकर मिटाना है।

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मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।